मंदिर जाना है तो मौन साधो, मार्ग में न करो संसार की बात- निर्यापक मुनिश्री योग सागरजी

Jul 21, 2025 - 20:30
Jul 21, 2025 - 20:32
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मंदिर जाना है तो मौन साधो, मार्ग में न करो संसार की बात- निर्यापक मुनिश्री योग सागरजी

गुना (आरएनआई) दुनिया को दिखाकर धर्म करना प्रदर्शन है और अपने आप को देखकर धर्म करना दर्शन है। प्रत्येक संसारी प्राणी को प्रतिक्षण आत्मा में शुभ अथवा अशुभ एक न एक भाव होते रहते हैं। आत्मा में होने वाले परिणाम ही हमारे भाव होते हैं। स्पर्श रस गंध और वर्ण यह पुदगल की पहचान है। जो चर्म चक्षु हमारी आंखों से दिख रहहा है वह सब कुछ पुदगल है। निश्चय से हमारी आत्मा और व्यवहार से अरहंत भगवान हमें शरणभूत होते हैं। ऐसे सच्चे देव, शास्त्र और निग्र्रंथ मुनिराज के पास जाकर हमें संसार की घर गृहस्थी की बच्चों की धन दौलत की बातें न करके सिर्फ उन जैसा बनने की बात करनी चाहिए। वंदे तद्गुण लब्धेय में आप जैसा बन जाऊं। उक्त आध्यात्मिक धर्मोपदेश निर्यापक मुनिश्री योग सागरजी महाराज ने चौधरी मोहल्ला स्थित महावीर भवन में कार्तिकेअनुप्रेक्षा महाग्रंथ का स्वाध्याय कराते हुए व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि भगवान रागी, द्वेषी नहीं होते हैं। उन वीतरागी भगवान की आराधना करने से हमारी अनादिकाल के पापों की निर्जरा होती है और हम हमारे अंदर विराजमान चैतन्य चमत्कारिक आत्मा की महिमा को पहचानने लगते हैं। कर्म की चोट को झेलने वाला अध्यात्म होता है। गुरुओं के चरणों में बैठकर अपने आप को जानना, अपने आप को समझना ही कर्मों की चोट को झेलना है। सत्य कहे तो आज हमें भगवान के दर्शन भी नहीं कर पा रहे हैं। घर में हाथ मेंं द्रव्य श्रीफल लेकर मंदिर जावे तो रास्ते में कोई भी घर गृहस्थी की संसार की बातें न कर मौन से जाए। सिर्फ भगवान से बात करें, उनकी वीतरागी मुद्रा को देखकर अपने अंदर विराजमान आत्मा का ध्यान करें। ऐसा करना ही सच्चे मायने में भगवान के दर्शन करना है। प्रभु के गुणानुवाद करने से हमारा जीवन सुधर जाता है। स्वंभू स्त्रोत में आचार्य महाराज ने प्रभु की भक्ति का विस्तार से वर्णन किया है।

इस मौके पर मुनिश्री ने एक महिला जो नाक में नथनी पहनकर आई थी उसका उदाहरण देते हुए कहा कि सोने की नथनी पहनकर उस नथनी की महिमा गाती थी। पर जिस नाक में पहनकर आई थी उसे गाड़ कर रही थी। जबकि नाक ही न होगी न नथनी पहनेंगी। ठीक उसी प्रकार हमें अपने शरीर की महिला तो आती है पर उसमें विराजमान आत्मतत्व की महिमा नहीं आती। जिस दिन हमें आत्मदर्शन हो जाएगा उस दिन हमें सम्यक्त के सन्मुख खड़े जाएंगे और एक न एक दिन मोक्ष को प्राप्त कर लेंगे। मुनिश्री ने कहा कि सारे शास्त्रों का सार यही है जीव जुदा पुदगल जुदा, यही तत्व का सार और कछु न जानिए याही का विस्तार। चारों अनुयोगों के सभी शास्त्रों में जीव और पुदगल अलग-अलग हैं, परंतु अनादिकाल से दोनों साथ रहते हैं। तो अज्ञानी संसारी प्राणी पुदगल शरीर को ही आत्मा मान लेता है। बस इसी को पृथक बताने के लिए कार्तिकेअनुप्रेक्षा मेें बारह भावनाओं के द्वारा अनादिकाल की भूल को समझाया गया है। अभेद रत्नात्रय चारित्र को गृहण करने से ही मुक्ति की प्राप्ति होगी। दर्शन, ज्ञान और चारित्र ही हमें शरणभूत है, दुनिया में कोई भी हमें शरण नहीं दे सकता।  इस मौके पर जैन महिला कैंट द्वारा आचार्यश्री की पूजन गणवेश में आकर की गइ्र। वहीं गुना गौरव गुणसागरजी महाराज के गृहस्थ जीवन के कठ्रया परिवार ने दीप प्रज्जवलन और शास्त्रदान किया।

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