भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अमेरिकी कंपनियों पर अत्यधिक निर्भर, आत्मनिर्भरता की अनिवार्यता बढ़ी

भारत आज आईटी हब के रूप में दुनिया में पहचान रखता है, लेकिन देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था बड़ी हद तक अमेरिकी कंपनियों पर निर्भर है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, मेटा और एक्स जैसी टेक दिग्गज कंपनियाँ न केवल रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रशासन और आर्थिक ढांचे की रीढ़ बन चुकी हैं।

Sep 22, 2025 - 00:00
 0  216
भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था अमेरिकी कंपनियों पर अत्यधिक निर्भर, आत्मनिर्भरता की अनिवार्यता बढ़ी

नई दिल्ली (आरएनआई) भारत आज आईटी हब के रूप में दुनिया में पहचान रखता है, लेकिन देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था बड़ी हद तक अमेरिकी कंपनियों पर निर्भर है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, मेटा और एक्स जैसी टेक दिग्गज कंपनियाँ न केवल रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रशासन और आर्थिक ढांचे की रीढ़ बन चुकी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का डिजिटल आधार विदेशी कंपनियों, विशेषकर अमेरिकी संस्थानों जैसे गूगल अल्फाबेट, माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़न, एक्स और मेटा पर अत्यधिक निर्भर है। ईमेल सेवाओं से लेकर क्लाउड स्टोरेज, सर्च इंजन और ऑपरेटिंग सिस्टम तक अधिकांश आधारभूत ढांचे पर इन कंपनियों का वर्चस्व है। निसंदेह यह स्थिति भारत की डिजिटल संप्रभुता के लिए गंभीर चुनौती है।

डिजिटल निर्भरता का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि इसे किसी भी समय राजनीतिक अस्त्र के रूप में बदला जा सकता है। हाल में अमेरिका ने टैरिफ वॉर के माध्यम से कई देशों पर उच्च आयात शुल्क लगाया। यदि इसी तरह की रणनीति डिजिटल क्षेत्र में अपनाई जाए, तो परिणाम और अधिक भयावह होंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति कोई कार्यकारी आदेश पारित कर गूगल, माइक्रोसॉफ्ट या अमेज़न जैसी कंपनियों को भारत की क्लाउड सेवाओं, ईमेल या सॉफ़्टवेयर अपडेट रोकने का निर्देश दें, तो बैंकिंग, स्वास्थ्य, रक्षा, आपूर्ति सेवा, ऊर्जा, परिवहन और संचार जैसे क्षेत्रों में संकट उत्पन्न हो सकता है।

कुछ समय पूर्व यह देखा गया कि माइक्रोसॉफ्ट सेवाओं में व्यवधान के कारण वैश्विक स्तर पर एयरलाइंस, बैंक और मीडिया हाउस प्रभावित हुए। इसके अलावा भारत में डिजिटल विज्ञापन, क्लाउड सेवाओं और ऑपरेटिंग सिस्टम का अधिकांश हिस्सा अमेरिकी कंपनियों के हाथ में है। यदि ये कंपनियाँ शुल्क बढ़ा दें या भारतीय संस्थानों को प्रतिबंधित सूची में डाल दें, तो उद्योग जगत और व्यापार संकट में आ सकते हैं। यूट्यूब, गूगल सर्च या माइक्रोसॉफ्ट की सेवाओं से अचानक भारतीय भाषाओं की सामग्री हटा दी जाए, तो करोड़ों भारतीय उपभोक्ता और कंटेंट क्रिएटर्स डिजिटल रूप से हाशिये पर चले जाएंगे।

चीन और यूरोपीय संघ के उदाहरण भारत के लिए अनुकरणीय हैं। चीन ने डिजिटल संप्रभुता के महत्व को भांपकर राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए तेजी से कदम उठाए, जबकि यूरोपीय संघ ने बड़े डेटा सुरक्षा कानून बनाकर अमेरिकी कंपनियों के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश की। भारत का विशाल इंटरनेट उपभोक्ता बाजार और डेटा भंडार अमेरिकी IT कंपनियों के लिए मूल्यवान संसाधन है, जिसका उपयोग वे अपने AI मॉडल और एल्गोरिद्म को प्रशिक्षित करने में कर रहे हैं। भारत को अपने डेटा की सुरक्षा और नियंत्रण पर ध्यान देकर इस सबसे बड़ी संपदा पर नियंत्रण बनाए रखना होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास विकल्प हैं। विशाल IT प्रतिभा, तेजी से बढ़ता स्टार्टअप इकोसिस्टम और डिजिटल साक्षरता मिलकर एक स्वतंत्र डिजिटल मॉडल खड़ा कर सकते हैं। नीति-निर्माताओं को स्थानीय क्लाउड और ऑपरेटिंग सिस्टम विकसित करने के लिए सक्षम नीतियों को दिशा देनी होगी, सरकारी विभागों में घरेलू तकनीकी समाधानों का अनिवार्य प्रयोग करना होगा और डेटा लोकलाइजेशन नियमों को और सख्त बनाना होगा। रक्षा क्षेत्र में माइक्रोसॉफ्ट ऑपरेटिंग सिस्टम के स्थान पर लिनक्स अथवा स्थानीय प्लेटफार्म को प्राथमिकता देने पर विचार करना होगा।

विश्लेषकों का कहना है कि डिजिटल संप्रभुता ही 21वीं सदी की असली आज़ादी है। सवाल यह है कि भारत समय रहते डिजिटल आत्मनिर्भर बनेगा या तब जब प्रतिबंध लगेंगे और देश ऑनलाइन दुनिया से कट जाएगा।

Follow RNI News Channel on WhatsApp: https://whatsapp.com/channel/0029VaBPp7rK5cD6X

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0
Subir Sen Founder, RNI News