गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में तेजा सिंह समुंद्री पर पुस्तक का विमोचन, संगत-पंगत की परंपरा को बताया एकता की आधारशिला

(सुरेश रहेजा, परवीन कुमार, साहिल रहेजा)

May 5, 2026 - 20:10
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गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में तेजा सिंह समुंद्री पर पुस्तक का विमोचन, संगत-पंगत की परंपरा को बताया एकता की आधारशिला

अमृतसर (आरएनआई) गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में यूनिवर्सिटी के गोल्डन जुबली कन्वेंशन सेंटर में एस. तेजा सिंह समुंद्री की लाइफ जर्नी और कंट्रीब्यूशन पर आधारित एक सेमिनार और बुक रिलीज़ सेरेमनी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर, श्री तेजा सिंह समुंदरी के जीवन पर डॉ. प्यार सिंह द्वारा लिखित और कुलपति प्रो. करमजीत सिंह द्वारा अंग्रेजी में अनुवादित पुस्तक “तेजा सिंह समुंदरी: जीवन और योगदान” का विमोचन पंजाब के राज्यपाल और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री गुलाब चंद कटारिया, दिल्ली के उपराज्यपाल श्री तरनजीत सिंह संधू और चंडीगढ़ के डीजीपी डॉ. सागरप्रीत सिंह हुड्डा और अन्य अतिथियों द्वारा किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए, माननीय राज्यपाल श्री गुलाब चंद कटारिया ने सिख सुधार आंदोलन में श्री तेजा सिंह समुंदरी की भूमिका पर प्रकाश डाला और कहा कि उनकी विरासत भावी पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक है। उन्होंने कहा कि युवाओं को ऐसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों से अवगत कराना समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि संगत और पंगत जैसी परंपराओं ने समानता और एकजुटता की नींव रखी है जो वर्तमान और भविष्य में भी प्रासंगिक रहेगी भारत की ताकत उसकी लिखी हुई परंपरा में है, जिसने सदियों से हमारी राष्ट्रीय चेतना को ज़िंदा रखा है। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे पूर्वजों की कुर्बानी सिर्फ़ ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे आज भी हमें अपने समाज और देश की निस्वार्थ सेवा करने की प्रेरणा देती हैं। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे इन मूल्यों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ और देश की तरक्की में योगदान दें।

खास मेहमान के तौर पर बोलते हुए, श्री तरनजीत सिंह संधू ने अपने दादा श्री तेजा सिंह समुंद्री को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम सिर्फ़ एक ऐतिहासिक यादगार नहीं बल्कि विरासत को देखने का मौका है। उन्होंने कहा कि उनके दादा ने ब्रिटिश शासन के दबाव के आगे झुकने के बजाय लाहौर जेल में शहादत स्वीकार की थी।

उन्होंने कहा कि गुरुद्वारा सुधार आंदोलन में उनकी भूमिका संस्थाओं को मज़बूत करने से जुड़ी थी। गुरु का बाग और चाबिया वाले मोर्चों के दौरान अपनाई गई अहिंसा और अनुशासन की महात्मा गांधी ने भी तारीफ़ की थी। उन्होंने युवाओं से ईमानदारी, ज़िम्मेदारी और निस्वार्थ सेवा के मूल मंत्रों को अपनाने की अपील की। वाइस चांसलर प्रो. करमजीत सिंह ने कहा कि यह किताब मशहूर इतिहासकार डॉ. प्यार सिंह के काम पर आधारित एक ज़रूरी काम है और इसका इंग्लिश ट्रांसलेशन इस विरासत को दुनिया भर में ले जाने की एक कोशिश है। उन्होंने कहा कि ट्रांसलेशन का प्रोसेस सिर्फ़ एकेडमिक नहीं बल्कि एक अंदरूनी अनुभव था। उन्होंने कहा कि एस. समुंद्री की ज़िंदगी सेवा, हिम्मत और भक्ति की मिसाल है।

उन्होंने कहा कि यह किताब गुरुद्वारा सुधार आंदोलन में उनके अहम योगदान को डिटेल में बताती है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जब समाज में नैतिक मूल्यों की ज़रूरत महसूस हो रही है, तो ऐसी किताबें हमें सही रास्ता दिखाती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह हमारे लिए गर्व की बात है कि एस. तरनजीत सिंह संधू, जो एस. तेजा सिंह समुंद्री के पोते हैं, आज देश में एक ऊँचे पद पर रहकर इस महान विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी मौजूदगी इस घटना को एक ऐतिहासिक मोड़ देती है।

प्रो. करमजीत सिंह ने कहा कि यह किताब हमें हमारे पुरखों की कुर्बानियों की याद दिलाती है और हमें न सिर्फ़ इस विरासत को बचाकर रखने बल्कि इसे आगे बढ़ाने की भी प्रेरणा देती है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को अपना इतिहास सौंपना हम सबकी साझी ज़िम्मेदारी है।

इस मौके पर प्रिंसिपल डॉ. इंद्रजीत सिंह गोगोआनी ने सरदार तेजा सिंह समुंद्री के योगदान पर खास भाषण दिया, जबकि डॉ. अमरजीत सिंह ने किताब का रिव्यू पेश किया। इस फंक्शन में डीन, एकेडमिक अफेयर्स, प्रो. हरविंदर सिंह, रजिस्ट्रार प्रो. के.एस. चहल, डीन, स्टूडेंट वेलफेयर, प्रो. सतनाम सिंह देओल, प्रोफेसर इंचार्ज पब्लिक रिलेशंस, डॉ. रविंदर कुमार, डायरेक्टर पब्लिक रिलेशंस, श्री प्रवीण पुरी और बड़ी संख्या में दूसरे स्कॉलर, टीचर और स्टूडेंट्स मौजूद थे।

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