प्रेम का विकृत स्वरूप और रक्तरंजित संबंध : सामाजिक पतन के लिए उत्तरदायी कौन?

वरिष्ठ पत्रकार लक्ष्मीकान्त पाठक का सामाजिक चिंतन

Feb 15, 2026 - 12:00
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प्रेम का विकृत स्वरूप और रक्तरंजित संबंध : सामाजिक पतन के लिए उत्तरदायी कौन?

मानव सभ्यता का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि किसी भी समाज की स्थायित्व-शक्ति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, तकनीकी उन्नति या राजनीतिक सामर्थ्य पर आधारित नहीं होती; उसकी वास्तविक जड़ें उसके नैतिक अधिष्ठान, सांस्कृतिक चेतना, पारिवारिक अनुशासन और संबंधों की पवित्रता में निहित होती हैं। जब तक संबंधों के केंद्र में विश्वास, मर्यादा और आत्मसंयम विद्यमान रहते हैं, तब तक समाज अपने भीतर उत्पन्न होने वाले विकारों का संतुलन बनाए रखता है। किंतु वर्तमान समय में हम एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहे हैं, जहाँ संबंधों की आत्मिक गरिमा पर स्वार्थ, वासना, अहंकार और तात्कालिक सुख की प्रवृत्ति का प्रभुत्व बढ़ता प्रतीत हो रहा है।

आज समाचार माध्यमों में प्रेम प्रसंगों से उपजे अपराधों की घटनाएँ असामान्य नहीं रहीं। प्रेम में असफलता के कारण हिंसक प्रतिक्रियाएँ, दाम्पत्य संबंधों में अविश्वास के कारण घातक परिणाम, संदेह और अधिकारबोध के चलते चरम कदम—ये सब केवल अपराध-सूचनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक मानसिकता के संकेत हैं। ये घटनाएँ हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती हैं कि प्रेम, जो कभी जीवन का उत्सव और आत्मा का आलोक था, वह आज अनेक संदर्भों में विनाश का कारण क्यों बनता जा रहा है?

भारतीय चिंतन परंपरा में प्रेम को केवल आकर्षण या भावनात्मक निकटता नहीं माना गया, बल्कि उसे आत्मा की परिष्कृत अनुभूति के रूप में देखा गया। प्रेम का अर्थ था—त्याग, धैर्य, सहिष्णुता, समर्पण और परस्पर सम्मान। दाम्पत्य जीवन को केवल सामाजिक अनुबंध नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सहयात्रा माना गया। उसमें अधिकार से अधिक उत्तरदायित्व का स्थान था, और स्वामित्व से अधिक समर्पण की भावना थी।

परंतु आधुनिक जीवन की तीव्र गति, उपभोक्तावादी संस्कृति और व्यक्तिवादी सोच ने प्रेम की अवधारणा को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। आज प्रेम को प्रायः व्यक्तिगत संतुष्टि और आत्म-अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में देखा जाता है। इसमें प्रतिबद्धता की अपेक्षा तात्कालिक आकर्षण को महत्व दिया जाता है। संबंधों की गहराई की जगह उनकी त्वरित उपलब्धता और सुविधा को प्राथमिकता दी जाती है। जब संबंधों का आधार स्थायित्व के स्थान पर क्षणभंगुरता बन जाता है, तब उनमें उत्पन्न तनाव भी अधिक तीव्र और विनाशकारी हो जाता है।

प्रेम का सबसे बड़ा विकार तब उत्पन्न होता है जब वह स्वामित्व में बदल जाता है। जब एक व्यक्ति दूसरे को स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि अपनी निजी संपत्ति के रूप में देखने लगता है, तब संबंधों में संवाद और विश्वास का स्थान संदेह और नियंत्रण ले लेते हैं। यही स्वामित्व-बोध जब आहत होता है, तब वह प्रतिशोध और हिंसा का रूप धारण कर लेता है।

अनेक घटनाओं में देखा गया है कि संबंधों का विघटन सहन न कर पाने की मानसिकता, अस्वीकार को स्वीकार न कर पाने की दुर्बलता और आत्म-सम्मान के नाम पर पनपा अहंकार व्यक्ति को चरम कदम उठाने की ओर प्रेरित करता है। यह केवल व्यक्तिगत दुर्बलता नहीं, बल्कि भावनात्मक परिपक्वता के अभाव का द्योतक है।

परिवार समाज की मूल इकाई है। वही व्यक्ति को प्रेम, संयम, संवाद और सह-अस्तित्व का पाठ सिखाता है। किंतु बदलते सामाजिक ढाँचे में संयुक्त परिवारों का विघटन, माता-पिता की व्यस्तता, पीढ़ियों के बीच संवाद का अभाव और डिजिटल माध्यमों की निर्बाध पहुँच ने पारिवारिक संस्कारों की निरंतरता को प्रभावित किया है।

आज बच्चों और युवाओं को सूचना तो प्रचुर मात्रा में मिलती है, परंतु जीवन-मूल्यों का संतुलित मार्गदर्शन कम प्राप्त होता है। भावनाओं को समझने और नियंत्रित करने की शिक्षा परिवार और समाज दोनों स्तरों पर कमजोर पड़ी है। परिणामस्वरूप संबंधों में उत्पन्न तनाव को सुलझाने के बजाय उससे पलायन या आक्रामक प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

वर्तमान युग में सफलता और सुख का मानक प्रायः भौतिक उपलब्धियों से निर्धारित किया जाता है। उपभोग, प्रदर्शन और प्रतिस्पर्धा की प्रवृत्ति ने जीवन की प्राथमिकताओं को परिवर्तित कर दिया है। संबंध भी कहीं-कहीं इस मानसिकता से अछूते नहीं रहे। जब संबंधों को भी उपलब्धि या प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगता है, तब उनकी आत्मिक गरिमा क्षीण हो जाती है।

भौतिक साधनों की प्रचुरता के बावजूद भावनात्मक शून्यता का अनुभव व्यक्ति को भीतर से असंतुलित करता है। वह संबंधों से अपेक्षाएँ तो अधिक रखता है, परंतु उनके निर्वहन के लिए आवश्यक धैर्य और त्याग नहीं दिखा पाता। यही असंतुलन अंततः विघटन और हिंसा का कारण बनता है।

यह सत्य है कि कानून समाज को नियंत्रित रखने के लिए आवश्यक है। कठोर दंड अपराध को सीमित करने का एक साधन हो सकता है, परंतु वह व्यक्ति के अंतःकरण में विवेक और संवेदना का संचार नहीं कर सकता। कानून बाहरी व्यवहार को नियंत्रित करता है, परंतु आंतरिक भावनाओं और प्रवृत्तियों को परिष्कृत नहीं कर सकता।

जब तक व्यक्ति स्वयं यह न समझे कि प्रेम अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है; स्वतंत्रता उच्छृंखलता नहीं, बल्कि संयम के साथ निर्णय लेने की क्षमता है—तब तक केवल दंड के भय से समाज में स्थायी सुधार संभव नहीं।

युवा पीढ़ी ऊर्जा, आकांक्षा और परिवर्तन की वाहक होती है। यदि उसे सही दिशा मिले, तो वही समाज के पुनर्निर्माण का आधार बन सकती है। आवश्यक है कि शिक्षा प्रणाली में भावनात्मक साक्षरता, संवाद कौशल और नैतिक विवेक को महत्व दिया जाए। युवाओं को यह सिखाया जाए कि अस्वीकार जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्म-विकास का अवसर है; संबंधों का विघटन पराजय नहीं, बल्कि परिपक्वता की परीक्षा है।

समाज की निष्क्रियता भी इस संकट की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। जब सकारात्मक मूल्यों के पक्ष में सामूहिक स्वर नहीं उठते और केवल सनसनीखेज घटनाएँ चर्चा का विषय बनती हैं, तब नकारात्मक प्रवृत्तियाँ अनायास ही प्रमुखता प्राप्त कर लेती हैं। समाज को केवल आलोचक नहीं, बल्कि मार्गदर्शक बनना होगा।

इस समूचे संकट का समाधान बाहरी नियंत्रण में नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन में निहित है। व्यक्ति को आत्मसंयम और आत्मावलोकन की आदत विकसित करनी होगी। परिवार को पुनः संवाद और संस्कार का केंद्र बनना होगा। शिक्षा को केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण का साधन बनाना होगा। समाज को नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

प्रेम का वास्तविक स्वरूप पुनः स्थापित करना समय की आवश्यकता है—ऐसा प्रेम जो सम्मान, विश्वास और त्याग पर आधारित हो; जो स्वतंत्रता को मर्यादा से जोड़ता हो; जो अधिकार से अधिक कर्तव्य को महत्व देता हो।

जब व्यक्ति अपने अंतःकरण में संयम और विवेक का दीप प्रज्वलित करेगा, जब परिवार संस्कारों की धरोहर को पुनर्जीवित करेगा और जब समाज नैतिकता को प्रगति का आधार मानेगा, तभी रक्तरंजित संबंधों की यह भयावह श्रृंखला विराम पाएगी।

अंततः प्रश्न यह नहीं कि उत्तरदायी कौन है; प्रश्न यह है कि उत्तरदायित्व स्वीकार कौन करेगा। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से का आत्मचिंतन और सुधार आरंभ करे, तो सामाजिक पुनर्जागरण का स्वर्णिम प्रभात दूर नहीं। प्रेम पुनः जीवन का उत्सव बन सकता है—बशर्ते हम उसे स्वार्थ और अहंकार की संकीर्ण परिभाषाओं से मुक्त कर उसकी आत्मिक गरिमा को पुनर्स्थापित करने का साहस दिखाएँ।

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