बाबा सत्यनाथ मठ: अघोर साधना की सत्य परंपरा का मौन संकट

सुल्तानपुर जिले के कादीपुर क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन अघोरपीठ, जो सनातन धर्म के नौ नाथों में से एक की तपस्थली माना जाता है, आज विस्मृति और विडंबना का जीवंत उदाहरण है।

Nov 3, 2025 - 21:00
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बाबा सत्यनाथ मठ: अघोर साधना की सत्य परंपरा का मौन संकट

उत्तर प्रदेश की भूमि सदियों से धर्म, साधना और समरसता की जननी रही है। यही भूमि नाथ, अघोर और शैव साधना की गवाह रही है—जहाँ त्याग, तंत्र और तप का संगम होता है। इसी परंपरा के प्रतीक हैं अघोरपीठ बाबा सत्यनाथ मठ, अल्दे मऊ, नूरपुर, कादीपुर, सुल्तानपुर — जहाँ 4 नवम्बर से 6 नवम्बर 2025 तक बाबा सत्यनाथ महोत्सव (दिव्य-भव्य देव दीपावली) का भव्य आयोजन किया जाएगा।

तीन दिवसीय इस धार्मिक उत्सव में विशाल मेला, शोभायात्रा, राष्ट्रीय परिचर्चा, प्रवचन, लोक कला प्रदर्शन, लोक गायन एवं भंडारा का आयोजन होगा। मठ परिसर में सजावट और दीपोत्सव की भव्य तैयारियां की जा रही हैं। यह कार्यक्रम अघोरपीठ, हरिश्चन्द्र घाट एवं अघोरपीठ बाबा सत्यनाथ मठ के पीठाधीश्वर अवधूत कपाली बाबा के सानिध्य में संपन्न होगा। इस अवसर पर देशभर से श्रद्धालु, साधु-संत और भक्त बड़ी संख्या में पहुंचकर बाबा सत्यनाथ के दिव्य दर्शन करेंगे तथा भक्ति, भजन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेंगे।

लेकिन इसी भक्ति और दीपमालाओं के बीच एक गहरी सच्चाई भी छिपी है—एक ऐसी सच्चाई जो अघोर साधना की मौन पुकार बन चुकी है।

सुल्तानपुर जिले के कादीपुर क्षेत्र में स्थित यह प्राचीन अघोरपीठ, जो सनातन धर्म के नौ नाथों में से एक की तपस्थली माना जाता है, आज विस्मृति और विडंबना का जीवंत उदाहरण है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल ही में स्थानीय विधायक राजेश गौतम के प्रयासों से इस मठ के विकास हेतु लगभग एक करोड़ रुपये की स्वीकृति दी है। कागज़ों पर यह “धार्मिक पुनर्जागरण” का प्रमाण है, पर ज़मीनी सच्चाई इससे कहीं गहरी और कड़वी है।

योगी आदित्यनाथ स्वयं नाथ संप्रदाय के महंत हैं, लेकिन उन्होंने अपने ही नाथ मूल की इस धरोहर को न कभी देखा, न कभी सार्वजनिक रूप से उसका नाम लिया। करोड़ों अनुयायियों वाले उनके सोशल मीडिया मंचों पर इस धाम के लिए एक शब्द तक नहीं लिखा गया। यह चुप्पी आकस्मिक नहीं, योजनाबद्ध है—क्योंकि आज की राजनीति में “नाथ” और “अघोर” जैसे कठिन, गहरे आध्यात्मिक मार्गों के लिए कोई स्थान नहीं बचा। सत्ता को सुविधाजनक हिन्दुत्व चाहिए—जो नारा बन सके, वोट दे सके, पर साधना और सत्य से दूर रहे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा वर्षों से “संस्कृति संरक्षण” और “सनातन गौरव” के नाम पर राजनीति करते आए हैं। आरएसएस इसे “राष्ट्रधर्म” कहता है। पर यह कैसा संरक्षण है, जहाँ अघोरपीठ जैसे प्राचीन आध्यात्मिक केंद्र उपेक्षा की धूल में दबे पड़े हैं?

काशी और अयोध्या की चकाचौंध में ये परंपराएँ मिटती जा रही हैं—क्योंकि इनकी राजनीति में चमक नहीं, गहराई है। मोदी-योगी शासन में सनातन “धर्म” नहीं रहा, बल्कि एक राजनीतिक उत्पाद बन गया है—जहाँ धर्म का अर्थ सिर्फ़ उत्सव और प्रचार है, आत्मानुशासन और तपस्या नहीं।

बाबा सत्यनाथ की यह भूमि, जहाँ अघोर साधना की पाँच धाराएँ—हादी, कादी, ओमादी, वागादी, प्रणवादी—जन्मीं, वही आज विकास के नाम पर राजनीतिक फोटो सेशन का मंच बन गई है।

जो परंपरा समाज के हाशिये पर खड़े व्यक्ति को शिव का रूप मानती थी, उसी को अब भाजपा के “हिन्दुत्व ब्रांड” ने हाशिये पर पहुँचा दिया है।

इन सबके बीच इस मठ को जीवित रखने की जिम्मेदारी केवल अवधूत उग्रचंडेश्वर कपाली बाबा के कंधों पर है। वे हरिश्चंद्र घाट, वाराणसी से लेकर सुल्तानपुर तक अघोर परंपरा की लौ जलाए रखने वाले सच्चे साधक हैं। उनकी दिनचर्या किसी प्रशासनिक सहायता से नहीं, बल्कि अपने श्रम और श्रद्धा से चलती है।

वे ही इस भूले-बिसरे धाम को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। पर यह आसान नहीं। उनके आश्रम पर धीरे-धीरे अतिक्रमण किया जा रहा है — और दुख की बात यह कि ये अतिक्रमण वही लोग कर रहे हैं जो मंचों पर “सनातन धर्म के रक्षक” होने का दावा करते हैं। स्थानीय प्रभावशाली और तथाकथित भक्त — जिन्होंने बाबा के सान्निध्य में “सेवा” के नाम पर जगह ली — अब वही अपने निजी स्वार्थ के लिए जुटे हैं। आज भक्त नहीं, व्यापारी ज्यादा हैं। सबको लाभ चाहिए, सेवा नहीं। प्रशासन और राजनीति दोनों मौन हैं, क्योंकि इनमें से कुछ लोग सत्ता से जुड़ चुके हैं।

कपाली बाबा की आँखों में वह पीड़ा साफ झलकती है — जब वे मठ की दीवारों पर उगते झाड़-झंखाड़ देखते हैं, या अपने गुरुपरंपरा के स्थान को राजनीतिक भाषणों के शोर में खोते हुए महसूस करते हैं।

आज जो लोग इस तीन दिवसीय महोत्सव में जयकारे लगा रहे हैं, वही बीते वर्षों में इसकी उपेक्षा में सहभागी रहे हैं। कोई भी वास्तव में धर्म के लिए नहीं, सिर्फ अपने लाभ के लिए यहां आया है।

अवधूत कपाली बाबा लोककला, नाथ दर्शन और शैव समरसता के पुनर्जागरण की बात करते हैं, लेकिन भाजपा की मशीनरी इसे राजनीतिक इवेंट में बदल देती है। भक्ति और साधना के नाम पर अब स्पॉन्सरशिप और फोटोग्राफी ज्यादा होती है, आत्म-साक्षात्कार कम।

सवाल यह नहीं कि एक करोड़ रुपये मिले या नहीं।

सवाल यह है कि नाथ और अघोर परंपरा की आत्मा कहाँ खो गई?

क्या योगी आदित्यनाथ जैसे संन्यासी-मुख्यमंत्री को यह नहीं दिखता कि जिस परंपरा ने उन्हें पहचान दी, वही परंपरा आज अपने ही अनुयायियों द्वारा रौंदी जा रही है?

क्या भाजपा और आरएसएस को यह एहसास है कि सनातन का असली स्वरूप उन बाबा सत्यनाथों, कपालियों और अघोरियों में है—जो भक्ति को कर्म और करुणा के माध्यम से जीते हैं, न कि माइक और मंच से?

बाबा सत्यनाथ मठ का यह महोत्सव केवल दीपोत्सव नहीं, बल्कि हमारे सामूहिक पाखंड का दर्पण है।

योगी, मोदी, भाजपा और आरएसएस सब मिलकर सनातन को “इवेंट” बना चुके हैं, जबकि कपाली बाबा जैसे साधक आज भी उसी मठ की टूटी दीवारों के बीच से सत्य और शिव की पुकार सुन रहे हैं।

जब तक सत्ता साधना के सामने नतमस्तक नहीं होगी, तब तक यह हिन्दुत्व सिर्फ़ नारा और नारायण के बीच की दूरी बना रहेगा — बाहर से सुनहरा, अंदर से खोखला।

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Subir Sen Founder, RNI News