सप्त मातृकाएँ: देवी शक्ति के सात दिव्य स्वरूप, जिनकी लीलाओं से हुआ दैत्यों का संहार
हिन्दू धर्म में सप्त मातृकाओं को देवी शक्ति की अत्यंत प्राचीन, रहस्यमयी और शक्तिशाली अभिव्यक्ति माना जाता है। पुराणों, आगमों तथा तांत्रिक ग्रंथों में इनका विशेष महत्व बताया गया है। इनका उल्लेख मुख्य रूप से मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य, मत्स्य पुराण, वामन पुराण और अनेक तांत्रिक ग्रंथों में मिलता है। सप्त मातृकाएँ सात प्रमुख देवताओं की शक्तियों का स्त्री स्वरूप मानी जाती हैं, जो देवताओं की सामूहिक शक्ति के रूप में प्रकट होकर दैत्यों का संहार करती हैं और सृष्टि की रक्षा करती हैं।
सप्त मातृकाओं में ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुंडा शामिल हैं। इन सातों देवियों को मिलकर आदिशक्ति का युद्धरूप माना जाता है। शक्ति उपासना और तांत्रिक परंपरा में इनका स्थान अत्यंत ऊँचा माना जाता है, क्योंकि यह देवशक्तियों के संगठित स्वरूप का प्रतीक हैं।
देवी महात्म्य के अनुसार जब शुंभ, निशुंभ, चंड, मुंड और रक्तबीज जैसे असुरों ने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों में अत्याचार करना शुरू कर दिया, तब देवताओं ने आदिशक्ति की आराधना की। उनकी स्तुति से देवी दुर्गा प्रकट हुईं और असुरों से भीषण युद्ध आरंभ हुआ। इसी युद्ध के दौरान देवताओं के शरीर से उनकी शक्तियाँ स्त्री रूप में प्रकट हुईं। ब्रह्मा की शक्ति से ब्राह्मी, भगवान शिव की शक्ति से माहेश्वरी, भगवान कार्तिकेय की शक्ति से कौमारी, भगवान विष्णु की शक्ति से वैष्णवी, विष्णु के वराह अवतार की शक्ति से वाराही, इन्द्र की शक्ति से इन्द्राणी और देवी के क्रोध से चामुंडा प्रकट हुईं। इन सभी देवियों ने देवी दुर्गा के साथ मिलकर असुरों का विनाश किया।
ब्राह्मी को ब्रह्मा की शक्ति माना जाता है। उनका वर्ण पीत बताया गया है और उनका वाहन हंस है। उनके हाथों में कमंडल, अक्षसूत्र, वेद और वरमुद्रा होती है। वे ज्ञान और सृष्टि की रचनात्मक शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। माहेश्वरी भगवान शिव की शक्ति हैं और उनका वाहन वृषभ अर्थात नंदी है। उनके हाथों में त्रिशूल, डमरू, खड्ग और पाश जैसे अस्त्र होते हैं। उनका स्वरूप तेजस्वी और उग्र माना जाता है, जो रुद्रशक्ति के साथ असुरों का संहार करती हैं।
कौमारी भगवान कार्तिकेय की शक्ति हैं और उनका वाहन मयूर है। वे युवती रूप में दिखाई देती हैं और उनके हाथों में शक्ति अर्थात भाला, धनुष और बाण होते हैं। उन्हें देवसेना की सेनापति के समान माना जाता है। वैष्णवी भगवान विष्णु की शक्ति हैं जिनका वाहन गरुड़ है और उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म होते हैं। वे धर्म की रक्षा करने वाली शक्ति मानी जाती हैं।
वाराही विष्णु के वराह अवतार की शक्ति हैं और उनका मुख वराह के समान बताया गया है। उनका स्वरूप अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है और वे पृथ्वी की रक्षक शक्ति के रूप में पूजित हैं। इन्द्राणी इन्द्र की शक्ति हैं जिनका वर्ण स्वर्ण के समान बताया गया है और उनका वाहन ऐरावत हाथी है। उनके हाथों में वज्र और कमल होता है और वे देवताओं की रक्षिका मानी जाती हैं।
सप्त मातृकाओं में चामुंडा का स्वरूप सबसे उग्र और भयानक माना जाता है। उनका शरीर कृश और काला बताया गया है तथा वे कपालमाला धारण करती हैं। उनके हाथों में खड्ग, त्रिशूल और कपाल होते हैं। चामुंडा को श्मशान में निवास करने वाली देवी माना जाता है और तांत्रिक साधनाओं में उनका विशेष महत्व है।
सप्त मातृकाओं की सबसे प्रसिद्ध लीला रक्तबीज के वध से जुड़ी हुई है। रक्तबीज नामक असुर को वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से गिरने वाली हर रक्त की बूंद से एक नया असुर पैदा हो जाएगा। जब देवी और मातृकाएँ उससे युद्ध करने लगीं तो उसके रक्त से असंख्य असुर उत्पन्न होने लगे। तब देवी ने चामुंडा को आदेश दिया कि वे उसका रक्त भूमि पर गिरने से पहले ही पी लें। चामुंडा ने अपना विशाल मुख फैलाकर रक्तबीज का रक्त पी लिया और इस प्रकार नए असुरों का जन्म रुक गया। इसके बाद देवी और मातृकाओं ने मिलकर उसका वध कर दिया।
तंत्र और शक्ति साधना में सप्त मातृकाओं को अत्यंत गूढ़ और शक्तिशाली देवियाँ माना जाता है। इनकी उपासना विशेष रूप से रक्षा, शत्रु विजय, भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति और तांत्रिक सिद्धियों की प्राप्ति के लिए की जाती है। वाराही, चामुंडा और माहेश्वरी की साधना को विशेष रूप से अत्यंत रहस्यमयी और प्रभावशाली माना गया है।
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