गुमनाम प्रचारक रामचंद्र पांडेय: संगठन की नींव में छिपा वह चेहरा, जिसकी चर्चा कम लेकिन असर बड़ा
नई दिल्ली/कोलकाता (आरएनआई) भारतीय राजनीति में अक्सर चुनावी जीत का श्रेय बड़े नेताओं, रैलियों और रणनीतियों को दिया जाता है, लेकिन इन जीतों की बुनियाद में ऐसे कई गुमनाम चेहरे भी होते हैं, जो वर्षों तक जमीन पर काम कर संगठन को खड़ा करते हैं। ऐसा ही एक नाम है रामचंद्र पांडेय, जिन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक धुरंधर और बेहद प्रभावशाली प्रचारक माना जाता है।
बताया जाता है कि पश्चिम बंगाल में संगठन को मजबूत करने और विभिन्न राजनीतिक व सामाजिक वर्गों के बीच संपर्क स्थापित करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। खास तौर पर 2016 विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें कोलकाता केंद्र बनाकर पूरे राज्य में संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने सिलिगुड़ी से लेकर मुर्शिदाबाद, मालदा, आसनसोल और बर्दवान तक कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित कर एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, प्रणब मुखर्जी का 2018 में नागपुर स्थित संघ मुख्यालय के कार्यक्रम में जाना भी एक अहम मोड़ माना गया, जिसके पीछे रामचंद्र पांडेय की रणनीतिक भूमिका बताई जाती है। इस घटनाक्रम ने बंगाल के भद्रलोक समाज में संघ और भाजपा के प्रति धारणा को बदलने में योगदान दिया।
इतना ही नहीं, वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी शुरुआती दौर में संगठन से जोड़ने का श्रेय पांडेय को दिया जाता है। लंबे समय तक उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में संगठन को मजबूत करने के बाद उन्होंने बंगाल में भी अपने अनुभव का इस्तेमाल किया।
1967 से प्रचारक जीवन की शुरुआत करने वाले रामचंद्र पांडेय ने करीब तीन दशक तक पूर्वी उत्तर प्रदेश, अवध और बुंदेलखंड में संगठन के विस्तार में योगदान दिया। सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले पांडेय आज भी बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपने कार्य में लगे हुए हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह माना जाता है कि चुनावी जीत केवल मंच पर दिखने वाले चेहरों की नहीं होती, बल्कि इसके पीछे ऐसे कई गुमनाम रणनीतिकार और कार्यकर्ता होते हैं, जो बिना किसी श्रेय के लगातार काम करते रहते हैं। रामचंद्र पांडेय उन्हीं में से एक माने जाते हैं, जिनका प्रभाव भले ही सार्वजनिक रूप से कम दिखे, लेकिन संगठनात्मक स्तर पर उनकी भूमिका बेहद अहम रही है।
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