असम में रिकॉर्ड 85.96% मतदान, सत्ता बनाम विपक्ष—किसके पक्ष में जाएगा जनादेश?

नव ठाकुरीया

Apr 17, 2026 - 18:10
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असम में रिकॉर्ड 85.96% मतदान, सत्ता बनाम विपक्ष—किसके पक्ष में जाएगा जनादेश?

असम में 9 अप्रैल 2026 को संपन्न हुए विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इस चुनाव में 85.96 प्रतिशत का ऐतिहासिक मतदान दर्ज किया गया, जो अब तक का सर्वाधिक है और जिसने सत्ता पक्ष तथा विपक्ष—दोनों के भीतर राजनीतिक समीकरणों को लेकर नई अटकलों को जन्म दे दिया है।

एक ही चरण में हुए इस चुनाव के लिए लगभग 2.50 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। इनमें 1.25 करोड़ महिलाएं और लगभग 6.4 लाख पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाता शामिल थे। राज्य की 126 विधानसभा सीटों पर कुल 722 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनके भाग्य का फैसला 4 मई को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) खुलने के साथ होगा। भारत का चुनाव आयोग इसी दिन असम के साथ केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम भी घोषित करेगा।

मतदान का यह अभूतपूर्व प्रतिशत केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक संकेतों से भरा हुआ है। राज्य के कई विधानसभा क्षेत्रों—परबतझोरा, गोलकगंज, गौरीपुर, धुबरी, बीरसिंह जरुआ, बिलासपुर, मनकाचर, जलेश्वर, गोलपारा पश्चिम और पूर्व, अभयपुरी, श्रीजंग्राम, बोंगाईगांव, मांडिया, चेंगा, पाकाबेटबारी, चमरिया, बरखेत्री, नलबाड़ी, दलगांव, लहरीघाट, ढिंग, रूपाहीहाट और समगुरी—में 90 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया। इसके विपरीत, कामरूप और कामरूप (महानगर) के शहरी क्षेत्रों—डिमोरिया, दिसपुर, गुवाहाटी मध्य, जालुकबारी और नया गुवाहाटी—में मतदान लगभग 80 प्रतिशत के आसपास रहा।

इतिहास पर नजर डालें तो असम में उच्च मतदान अक्सर सत्ता परिवर्तन का संकेत देता रहा है। 2016 में 84.72 प्रतिशत मतदान के बाद तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को हटाकर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला गठबंधन सत्ता में आया था। वहीं 1985 में 78.37 प्रतिशत मतदान के बाद असम गण परिषद ने सत्ता संभाली थी। ऐसे में इस बार का रिकॉर्ड मतदान राजनीतिक विश्लेषकों के लिए कई संभावनाओं को जन्म दे रहा है।

राजनीतिक विश्लेषण इस समय दो स्पष्ट खेमों में बंटा हुआ है। एक वर्ग का मानना है कि यह मतदान सत्ता समर्थक लहर (pro-incumbency wave) का संकेत है। उनके अनुसार, सुरक्षा व्यवस्था में सुधार, घुसपैठ-रोधी कदम, शांति समझौतों का क्रियान्वयन और विकास परियोजनाओं के साथ-साथ जनकल्याणकारी योजनाओं ने मतदाताओं का विश्वास जीता है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के आक्रामक प्रचार अभियान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की रैलियों से अतिरिक्त बल मिला, जिसने मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया।

विश्लेषकों का यह भी कहना है कि मुख्यधारा के असमिया मतदाता, जो सामान्यतः मतदान में अपेक्षाकृत कम सक्रिय माने जाते हैं, इस बार बड़ी संख्या में बाहर निकले। इसे वे भविष्य की पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी और राज्य के विकास को लेकर बढ़ती जागरूकता का संकेत मानते हैं।

इसके विपरीत, दूसरा वर्ग इस उच्च मतदान को सत्ता विरोधी लहर (anti-incumbency) के रूप में देख रहा है। विपक्षी दलों का तर्क है कि एक दशक के शासन के बाद जनता में असंतोष पनपा है, जो मतदान में बड़ी भागीदारी के रूप में सामने आया है। उन्होंने बेरोजगारी, अल्पसंख्यक समुदायों के मुद्दे और कथित भ्रष्टाचार को प्रमुख कारणों के रूप में प्रस्तुत किया है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गौरव गोगोई ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर तीखे आरोप लगाए। यह विवाद तब और बढ़ गया जब कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने सरमा और उनकी पत्नी रिंकी भुइयां पर गंभीर आरोप लगाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की। खेड़ा के दावों के बाद राजनीतिक माहौल और अधिक गरमा गया, हालांकि इन आरोपों को सत्ता पक्ष ने सिरे से खारिज किया।

इस चुनाव में एक और संवेदनशील मुद्दा उभरा—लोकप्रिय गायक ज़ुबीन गर्ग की रहस्यमयी मृत्यु। कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की और अपने घोषणापत्र में वादा किया कि सत्ता में आने पर 100 दिनों के भीतर न्याय सुनिश्चित किया जाएगा। हालांकि ज़ुबीन गर्ग के परिवार ने इस मुद्दे के राजनीतिकरण से बचने की अपील की और न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा जताया। विश्लेषकों के अनुसार, यह मुद्दा भावनात्मक असर जरूर डालता है, लेकिन इसका चुनावी लाभ किसे मिलेगा, यह स्पष्ट नहीं है।

महिला मतदाताओं की भागीदारी इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरी है। पिछले चुनावों की तुलना में इस बार महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया, जो सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों के प्रभाव को दर्शाता है। 2011 में जहां महिलाएं पीछे थीं, वहीं 2016 में उन्होंने बराबरी हासिल की और 2021 तथा 2026 में उन्होंने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया।

इसके साथ ही मतदाता सूची की विशेष समीक्षा, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना और मतदाताओं में बढ़ी जागरूकता ने भी मतदान प्रतिशत बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

इस बीच, ऊपरी असम की जोरहाट विधानसभा सीट ने विशेष ध्यान आकर्षित किया। यहाँ भाजपा के हितेंद्र नाथ गोस्वामी और कांग्रेस के गौरव गोगोई के बीच मुकाबला हुआ, लेकिन दोनों नेताओं ने संयमित और शिष्ट चुनाव प्रचार का उदाहरण पेश किया। सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक तस्वीर, जिसमें दोनों पक्षों के समर्थक साथ बैठकर चाय पीते नजर आए, ने इस सीट को राजनीतिक शालीनता के प्रतीक के रूप में स्थापित किया।

अन्य प्रमुख सीटों—जैसे सिबसागर, दिसपुर, गुवाहाटी सेंट्रल, तिहू और हाफलोंग—में भी कड़े मुकाबले देखने को मिले, जहाँ कई दिग्गज और युवा उम्मीदवार आमने-सामने हैं।

भाजपा के राज्य अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने विश्वास जताया है कि पार्टी अपने सहयोगियों—असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट—के साथ मिलकर 2021 के 75 सीटों के आंकड़े को पार करेगी। वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी दल भी मजबूत प्रदर्शन का दावा कर रहे हैं।

कुल मिलाकर, असम का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या निरंतरता का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह दो परस्पर विरोधी राजनीतिक धारणाओं—विकास और स्थिरता बनाम असंतोष और बदलाव—के बीच सीधी टक्कर बन चुका है। अब 4 मई को मतगणना के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि रिकॉर्ड मतदान ने किस राजनीतिक पक्ष को जनादेश दिया है।

(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

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