रामजन्मभूमि आंदोलन से मंदिर नियंत्रण तक: भाजपा पर हिंदू विरोधी नीतियों के आरोप तेज
सुधीर शुक्ला
वृन्दावन (आरएनआई) अयोध्या से शुरू हुई राजनीतिक यात्रा में भाजपा को “हिंदू हितैषी” छवि दिलाने वाला रामजन्मभूमि आंदोलन आज एक नए विवाद में घिर गया है। आलोचकों का कहना है कि जिस पार्टी ने 1989–92 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा और उमा भारती व साध्वी रितंभरा जैसे नेताओं के भाषणों से हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण किया, वही अब हिंदू मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की नीति को आगे बढ़ा रही है।
आरोप है कि “अयोध्या झांकी है, काशी-मथुरा बाकी है” जैसे नारों के पीछे वास्तविक फोकस मंदिरों के राज्य-नियंत्रण पर आ गया है। कई राज्यों में पहले से मौजूद म्युज़रई, HR&CE और एंडोमेंट कानून केवल हिंदू मंदिरों पर लागू होते हैं, जबकि मस्जिदों और चर्चों पर ऐसा प्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण नहीं है। भाजपा सरकारें भी इन कानूनों को खत्म करने के बजाय कई जगह इन्हें और सख्ती से लागू कर रही हैं।
ब्रज क्षेत्र में श्री बाँके बिहारी मंदिर ट्रस्ट अध्यादेश और 197 मंदिरों की सूची का मामला इस विवाद को और गहरा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अगस्त 2025 को बाँके बिहारी ट्रस्ट कानून के संचालन पर रोक लगाई, लेकिन आशंका बनी हुई है कि भविष्य में अन्य मंदिर भी इसी दायरे में आ सकते हैं।
आलोचक इसे “हिंदू संस्कृति के साथ मजाक” बताते हुए कहते हैं कि सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सड़क, बिजली और पानी जैसे बुनियादी कार्यों में विफल रहने के बाद मंदिरों की आय पर निगाहें गड़ाए हुए हैं। उनका तर्क है कि मंदिर-आय केवल धार्मिक और धर्मार्थ कार्यों में ही खर्च होनी चाहिए और इसके लिए पारदर्शी, समुदाय-आधारित प्रबंधन जरूरी है।
कानूनी मोर्चे पर इस असमानता को चुनौती देने, मंदिरों के लिए स्वतंत्र ट्रस्ट मॉडल अपनाने और आय-व्यय का सार्वजनिक ऑडिट सुनिश्चित करने की मांगें तेज हो रही हैं। हिंदू संगठनों का कहना है कि अगर अभी कानूनी और सामाजिक दबाव नहीं बनाया गया, तो भविष्य में और अधिक मंदिर सरकारी नियंत्रण में आ सकते हैं।
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