अवैध आरओ प्लांटों का जाल: नियम बेअसर, जनता की सेहत से खुला खिलवाड़

May 5, 2026 - 19:04
May 5, 2026 - 19:05
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अवैध आरओ प्लांटों का जाल: नियम बेअसर, जनता की सेहत से खुला खिलवाड़

हाथरस(आरएनआई)जनपद में पैकेज्ड पेयजल का कारोबार अब खुलेआम नियमों को धता बताकर चल रहा है। शहर से लेकर कस्बों तक 100 से अधिक आरओ प्लांट बिना वैध लाइसेंस के संचालित हो रहे हैं, जबकि खाद्य सुरक्षा विभाग के अनुसार पूरे जिले में केवल आठ प्लांट ही लाइसेंसधारी हैं। इसके बावजूद रोजाना हजारों पानी के कैंपर बाजार में खपाए जा रहे हैं, जो इस बात की ओर इशारा करता है कि अवैध कारोबार बिना किसी रोक-टोक के फल-फूल रहा है।शहर में लाइसेंस प्राप्त चार प्लांटों की उत्पादन क्षमता सीमित है। यदि ये प्लांट रोज 15 घंटे भी चलें, तो करीब 750 कैंपर ही तैयार कर सकते हैं, जबकि शहर में प्रतिदिन 8 से 10 हजार कैंपर की सप्लाई हो रही है। पूरे जिले में यह आंकड़ा 25 से 30 हजार तक पहुंच रहा है। ऐसे में साफ है कि बड़ी मात्रा में पानी अवैध प्लांटों से ही बाजार में पहुंच रहा है।

सवाल यह है कि जब यह अंतर साफ दिखाई दे रहा है, तो जिम्मेदार विभाग अब तक आंखें क्यों मूंदे हुए हैं।जानकारों के अनुसार अधिकांश अवैध प्लांटों में पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच नहीं होती। बैक्टीरिया, नाइट्रेट, आर्सेनिक और टीडीएस जैसे महत्वपूर्ण मानकों की अनदेखी की जा रही है। आरओ मेम्ब्रेन और फिल्टर समय पर नहीं बदले जाते, जिससे पानी की शुद्धता केवल कागजों में ही रह जाती है। ऐसे पानी का सेवन सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।चिकित्सकों के मुताबिक दूषित पानी से डायरिया, टाइफाइड, हैजा और हेपेटाइटिस ए व ई जैसी गंभीर बीमारियां फैल सकती हैं। वहीं नाइट्रेट और आर्सेनिक की अधिक मात्रा लंबे समय में किडनी फेलियर, कैंसर, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी समस्याओं को जन्म दे सकती है। यानी सस्ती कीमत में मिल रहा पानी, लोगों को महंगी बीमारियों की ओर धकेल रहा है।तालाब चौराहा, बस स्टैंड, सासनी गेट और जिला अस्पताल के आसपास खुलेआम नकली बोतलें और पाउच बेचे जा रहे हैं। नामी कंपनियों से मिलते-जुलते नाम और पैकिंग के जरिए लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। इन उत्पादों में न तो गुणवत्ता की गारंटी है और न ही किसी मानक का पालन।पैकेज्ड पेयजल बेचने के लिए बीआईएस प्रमाणन, एफएसएसएआई लाइसेंस, भूजल निकासी की अनुमति और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की एनओसी अनिवार्य है। इसके बावजूद जिले में इन नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है। सवाल यह उठता है कि जब नियम इतने स्पष्ट हैं, तो उनका पालन कराने की जिम्मेदारी निभाने में जिला प्रशासन क्यों नाकाम दिख रहा है।जिला प्रशासन समय-समय पर निरीक्षण और कार्रवाई के दावे जरूर करता है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। यदि केवल आठ लाइसेंस के सहारे हजारों कैंपर बाजार में पहुंच रहे हैं, तो यह आंकड़ों का खेल नहीं बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का आईना है। सेहत से जुड़े इतने गंभीर मुद्दे पर भी यदि कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित है, तो यह चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।अब देखना यह है कि जिम्मेदार विभाग इस खुले खेल पर लगाम लगाते हैं या फिर ‘शुद्ध पानी’ के नाम पर लोगों की सेहत यूं ही दांव पर लगी रहती है।

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