दीया कुमारी प्रकरण में भोपाल के दोनों पत्रकार रिहा — विरोध के आगे झुकी सत्ता, कलम की जीत
जयपुर/भोपाल (आरएनआई)। राजस्थान की डिप्टी मुख्यमंत्री दीया कुमारी से जुड़े कथित ब्लैकमेलिंग और मानहानि के प्रकरण में गिरफ्तार भोपाल के पत्रकार हरीश दिवेकर और आनंद पांडे को राजस्थान पुलिस ने रिहा कर दिया है। उनकी रिहाई के बाद देशभर के पत्रकार संगठनों और मीडिया जगत में राहत और संतोष का माहौल है। सोशल मीडिया पर पत्रकारों ने प्रतिक्रिया दी — “सत्ता हारी, कलम जीती।”
गिरफ्तारी के बाद भारी विरोध
दोनों पत्रकार ‘द सूत्र’ डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हैं। गिरफ्तारी के तुरंत बाद देशभर में बड़े पत्रकार संगठनों, संपादकों और प्रेस यूनियनों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया। कई जगहों पर विरोध ज्ञापन सौंपे गए और गिरफ्तारी को गैरकानूनी बताते हुए तत्काल रिहाई की मांग हुई।
आरोप क्या थे?
राजस्थान साइबर पुलिस ने 28 सितंबर 2025 को साइबर थाने, जयपुर कमिश्नरेट में FIR दर्ज की थी (नं. 0158)। इसमें शिकायतकर्ता नरेंद्र सिंह राठौड़ ने आरोप लगाया कि:
डिप्टी सीएम दीया कुमारी से जुड़ी मानहानिकारक खबरें प्रकाशित की गईं, इन्हें हटाने के बदले करोड़ों रुपये मांगे गए, संवैधानिक पदों की छवि धूमिल करने का प्रयास हुआ।
एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट की धाराएं शामिल की गई थीं, जिनमें मानहानि, भ्रामक सूचना, लोकसेवक को बाधित करने का प्रयास, डिजिटल धोखाधड़ी और इलेक्ट्रॉनिक अपराध से जुड़ी धाराएं भी थीं।
गिरफ्तारी पर कानूनी सवाल
एफआईआर में आरोपियों का नाम “अज्ञात” दर्ज होने के बावजूद राजस्थान पुलिस ने मध्य प्रदेश जाकर दोनों पत्रकारों को हिरासत में लिया। इस कार्रवाई ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि “क्या किसी अनाम एफआईआर के आधार पर राज्य से बाहर जाकर गिरफ्तारी उचित है?”
मीडिया संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक ढांचे और पुलिस प्रक्रिया पर आघात बताया।
'द सूत्र' की प्रतिक्रिया
मीडिया समूह ने गिरफ्तारी को सरकार द्वारा दबाव की कार्रवाई बताया था और कहा था कि यह स्वतंत्र पत्रकारिता को डराने का प्रयास है। संगठन ने साफ कहा था — “हम न झुकेंगे, न रुकेंगे।”
सम्मानजनक रिहाई, नया मोड़
अब दोनों पत्रकारों की सम्मानपूर्वक रिहाई के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया है। मीडिया जगत का मानना है कि यह सिर्फ दो व्यक्तियों की मुक्ति नहीं, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता की जीत है।
एक वरिष्ठ संपादक ने प्रतिक्रिया दी — “यह फैसला बताता है कि लोकतंत्र में कलम को चुप कराने की हर कोशिश नाकाम होगी।”
आगे क्या?
पुलिस जांच अभी जारी है। साइबर शाखा के अधिकारी हवा सिंह को डिजिटल साक्ष्य, वीडियो और सोशल मीडिया सामग्री खंगालने की जिम्मेदारी दी गई है।
इस पूरे विवाद ने सत्ता, मीडिया, कानून और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के रिश्ते को एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है।
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