कॉस्ट डेटा बुक का उल्लंघन: यूपी की सभी बिजली कंपनियाँ अवमानना की जद में, कार्यवाही तय
लखनऊ (आरएनआई) उपभोक्ता परिषद ने कॉस्ट डेटा बुक की अवमानना याचिका, जो आयोग में पहले से लंबित है, उसके तहत सभी कंपनियों के खिलाफ नई अवमानना याचिका दाखिल कर दी है। यह उल्लंघन का गंभीर मामला है।
उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने नियामक आयोग के अध्यक्ष व सदस्य से लंबी बैठक की। उन्होंने बताया कि बिजली कंपनियों ने प्रदेश की गरीब जनता का किस प्रकार शोषण किया है। अधिक वसूली की राशि वापस कराने और स्मार्ट प्रीपेड मीटर अनिवार्य किए जाने के फैसले को तत्काल वापस लेने की माँग उठाई गई।
उपभोक्ता परिषद ने कहा कि पाँचों बिजली कंपनियों के प्रबंध निदेशकों ने विद्युत नियामक आयोग में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर शपथ पत्र दिया था कि वे कॉस्ट डेटा बुक का उल्लंघन नहीं करेंगे। फिर उल्लंघन कैसे कर दिया गया? अब तत्काल सभी के खिलाफ विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 142 के तहत कार्यवाही शुरू की जाए।
कॉस्ट डेटा बुक के उल्लंघन में पहले भी बिजली कंपनियों के प्रबंध निदेशकों ने अपनी गर्दन फँसती देख, विद्युत उपभोक्ताओं को 3 से 4 करोड़ रुपये चेक से वापस किए थे। इस बार भी अधिक वसूली की रकम लौटानी होगी और कार्यवाही के लिए तैयार रहना होगा। कानून से बड़ा कोई नहीं।
उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन व प्रदेश की बिजली कंपनियों की मुश्किलें बढ़ना तय है। प्रदेश के विद्युत उपभोक्ताओं से बिना विद्युत नियामक आयोग की अनुमति लिए, स्मार्ट प्रीपेड मीटर के आधार पर ही नए बिजली कनेक्शन अनिवार्य रूप से देने और कॉस्ट डेटा बुक के विपरीत ₹872 की जगह स्मार्ट प्रीपेड मीटर मद में ₹6016 की वसूली तथा उपभोक्ताओं की सहमति के बिना 20 लाख से अधिक कनेक्शनों को प्रीपेड में कन्वर्ट करने के मामले में आज नया मोड़ आ गया। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष व राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने विद्युत नियामक आयोग के अध्यक्ष श्री अरविंद कुमार व सदस्य श्री संजय कुमार सिंह से मुलाकात कर लंबी बैठक की।
विद्युत नियामक आयोग की सुओ-मोटो याचिका 62 एसएम/2022, जो उपभोक्ता परिषद की शिकायत पर कॉस्ट डेटा बुक के उल्लंघन के मामले में अवमानना याचिका के रूप में शुरू की गई थी और वर्तमान में विचाराधीन है, उसमें प्रदेश की बिजली कंपनियों के सभी प्रबंध निदेशकों को विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 142 के तहत तलब किया गया था। वे आयोग में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए थे और स्वीकार किया था कि आगे से कॉस्ट 데이터 बुक का उल्लंघन नहीं होगा। सभी प्रबंध निदेशकों ने अलग-अलग शपथ पत्र भी दाखिल किए थे। अधिक वसूली के मामलों में बिजली कंपनियों ने चेक द्वारा उपभोक्ताओं को 3 से 4 करोड़ रुपये लौटाए थे।
अब उपभोक्ता परिषद ने इस याचिका में यह गंभीर मामला दाखिल करते हुए माँग की है कि यह कॉस्ट डेटा बुक का स्पष्ट उल्लंघन है और बिजली कंपनियों पर अवमानना की कार्यवाही तत्काल शुरू की जाए तथा सुनवाई की तिथि तत्काल घोषित की जाए।
प्रकाश पर्व दीपावली से एक माह पहले इस प्रकार का आदेश बिना आयोग की अनुमति के पूरे प्रदेश में लागू करने से गरीब उपभोक्ताओं में भारी आक्रोश है। दीपावली के शुभ अवसर पर हजारों गरीब उपभोक्ता कनेक्शन की लागत 6 गुना बढ़ने के कारण बिजली का कनेक्शन नहीं ले पा रहे हैं, जो सरकार की छवि धूमिल करने वाला एक बड़ा षड्यंत्र है। विद्युत नियामक आयोग के कानून के तहत गरीब बीपीएल उपभोक्ता को 1 किलोवाट कनेक्शन ₹1032 में मिलता है। अब स्मार्ट प्रीपेड मीटर अनिवार्य होने से ऐसे उपभोक्ताओं को ₹6176 तथा शहरी क्षेत्र में ₹6464 में मिलेगा, जो गरीब उपभोक्ताओं को लालटेन युग में ले जाने वाला फैसला है।
उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने कहा कि कॉस्ट डेटा बुक में दिए गए प्रावधानों के तहत ही उपभोक्ताओं को बिजली का कनेक्शन दिया जाता है। बिना नियामक आयोग की अनुमति के पावर कॉरपोरेशन ने स्मार्ट प्रीपेड मीटर के आधार पर कनेक्शन देना अनिवार्य कर दिया, जबकि विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) में स्पष्ट प्रावधान है कि उपभोक्ताओं को पोस्टपेड अथवा प्रीपेड कनेक्शन लेने का अधिकार है और वे दोनों में से कोई भी विकल्प चुन सकते हैं। ऐसे में पावर कॉरपोरेशन ने विद्युत अधिनियम 2003 का भी खुला उल्लंघन किया है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कॉस्ट डेटा बुक के उल्लंघन में पहले सभी प्रबंध निदेशक आयोग में तलब किए गए थे और उपस्थित होकर माफी माँगी थी कि अब उल्लंघन नहीं करेंगे। इसके बावजूद इस प्रकार की कार्यवाही की गई। ऐसे में यह सिद्ध हो गया है कि सभी के खिलाफ विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 142 के तहत कार्यवाही शुरू की जाए।
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