हाईकोर्ट में पहुंचा प्राइवेट स्कूलों का वेतन विवाद, शिक्षकों की सैलरी पर बड़ा सवाल
मथुरा/प्रयागराज (आरएनआई) प्रदेश के प्राइवेट स्कूलों और शिक्षकों के बीच वेतन विवाद एक बार फिर चर्चा में है। मथुरा के कुछ निजी स्कूल संचालकों ने एकजुट होकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। इन स्कूल संचालकों ने कोर्ट से मांग की है कि एनओसी की उस शर्त को समाप्त किया जाए, जिसके तहत निजी स्कूलों को अपने कर्मचारियों को राज्य सरकार के कर्मचारियों के बराबर वेतन व भत्ते देना अनिवार्य है।
यूट्यूब चैनल विद्यार्थी समय के आर.बी. वर्मा ने इस पूरे मामले को उजागर करते हुए बताया कि जब कोई प्राइवेट स्कूल सीबीएसई से एफिलिएशन लेता है, तो उसे राज्य सरकार से एनओसी प्राप्त करनी होती है। इस एनओसी में स्पष्ट शर्त होती है कि स्कूल अपने शिक्षकों और कर्मचारियों को राज्य कर्मचारियों के समान वेतन देगा। लेकिन हकीकत में अधिकांश निजी स्कूल इस शर्त का पालन नहीं कर रहे हैं।
आर.बी. वर्मा के अनुसार, आज हालात ऐसे हैं कि एक पोस्ट ग्रेजुएट टीचर (पीजीटी) को भी सरकारी विभाग में कार्यरत एक चपरासी से कम वेतन मिलता है। बावजूद इसके, शिक्षकों को काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यह स्थिति न केवल शिक्षकों के साथ अन्याय है बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी गहरा असर डालती है।
वर्मा ने मथुरा के कुछ स्कूलों की शिकायत शिक्षा विभाग से की थी। लगातार शिकायतों के बाद विभाग ने जांच कमेटियां गठित कीं। इससे स्कूल संचालकों को डर हुआ कि यदि जांच में गड़बड़ी साबित हुई तो उनकी एनओसी और सीबीएसई एफिलिएशन तक रद्द हो सकती है। इसी आशंका के चलते स्कूल संचालकों ने कोर्ट का रुख किया और अब वेतन से जुड़ी शर्त को ही हटाने की मांग रख दी है।
आर.बी. वर्मा ने चेतावनी दी कि यदि हाईकोर्ट ने यह शर्त हटा दी तो इसके गंभीर दूरगामी परिणाम होंगे।
“स्कूल पूरी तरह स्वतंत्र हो जाएंगे। वे और भी कम वेतन पर शिक्षक रख सकते हैं। कम वेतन पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षक मिलना मुश्किल होगा और नतीजतन बच्चों की शिक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। बच्चे को पढ़ाने के लिए शिक्षक चाहिए, दीवारें नहीं,” वर्मा ने कहा।
उन्होंने अभिभावकों को भी सचेत किया कि वे केवल स्कूल की इमारत, एसी क्लासरूम और बसों पर न जाएं, बल्कि यह भी पूछें कि बच्चों को पढ़ाने वाला शिक्षक कौन है और उसे कितनी तनख्वाह मिल रही है।
वर्मा ने बताया कि उन्होंने हाईकोर्ट की इस सुनवाई में पक्षकार बनने का प्रयास किया है ताकि शिक्षकों और शिक्षा प्रणाली की वास्तविक स्थिति अदालत के सामने रखी जा सके। उन्होंने शिक्षकों और अभिभावकों से सहयोग की अपील करते हुए कहा, “यह मामला केवल एक शिक्षक का नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वाला है। यदि हम चुप बैठे रहे तो प्राइवेट स्कूलों की मनमानी और बढ़ जाएगी।”
अब निगाहें इलाहाबाद हाईकोर्ट पर टिकी हैं। यदि अदालत ने स्कूल संचालकों की मांग स्वीकार कर ली तो यह प्रदेश भर के लाखों शिक्षकों और निजी शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करेगा। वहीं, यदि सरकार और समाज सक्रिय रूप से अपना पक्ष रख सके तो शिक्षकों को उचित वेतन दिलाने का रास्ता भी साफ हो सकता है।
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