‘वकील साहब, मत जाइए… आपकी जरूरत पड़ेगी’, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पारदीवाला ने क्यों कही यह टिप्पणी?
नई दिल्ली (आरएनआई)। सुप्रीम कोर्ट की एक शांत लेकिन सख्त कार्यवाही के दौरान ऐसा वाकया सामने आया, जिसने अदालत की गंभीरता के बीच हल्की-सी तल्ख मुस्कान भी घोल दी। मामला जब जस्टिस जे.बी. पारदीवाला की पीठ के समक्ष आया, तो अदालत में मौजूद एक याची की लगातार दखलअंदाजी ने खुद जज साहब को यह कहने पर मजबूर कर दिया—“वकील साहब, मत जाइए, आपकी जरूरत पड़ेगी।”
दरअसल, यह मामला सीमा सड़क कार्य बल के एक मैकेनिकल इंजीनियर की बहाली और बकाया वेतन से जुड़ा था। हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार याची को करीब 37 लाख रुपये का भुगतान किया जाना था। सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने सीधा और स्पष्ट सवाल किया—क्या आपको आपकी पूरी राशि मिल गई है? लेकिन इसके जवाब में याची ने हां या ना कहने के बजाय बातों को उलझाना शुरू कर दिया, मानो गूगल मैप्स की तरह अदालत को ही घुमाने लगे हों।
याची का कहना था कि उनके कोलकाता स्थित बैंक खाते में पैसा नहीं आया। जब अदालत ने इस पर और स्पष्टता मांगी, तो विभाग की ओर से पेश वकील ने साफ किया कि रकम तो राजौरी स्थित खाते में पहले ही ट्रांसफर की जा चुकी है। इस पर याची को आखिरकार यह स्वीकार करना पड़ा कि हां, उस खाते में पैसे मिल चुके हैं।
जस्टिस पारदीवाला अपनी सहनशीलता और संतुलित रवैये के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने याची की बातों को धैर्यपूर्वक सुना, लेकिन जैसे ही आदेश लिखवाना शुरू किया, याची एक बार फिर बीच में बोल पड़े। जज साहब ने कई बार समझाने की कोशिश की, मगर याची अपनी दलीलों से पीछे नहीं हटे। आखिरकार, अदालत का संयम जवाब दे गया और जस्टिस पारदीवाला ने सख्त लहजे में कहा—“अपना मुंह बंद रखिए और मुझे आदेश लिखवाने दीजिए। आपका व्यवहार देखकर लगता है कि आप नौकरी के लायक ही नहीं हैं।”
इसके बाद जज साहब ने वकील की ओर देखते हुए कहा कि “इसीलिए मैंने आपसे रुकने को कहा था।” मानो यह स्पष्ट कर दिया गया हो कि जब मुवक्किल कानून से ज्यादा अपनी कहानियों पर भरोसा करने लगे, तो अदालत की मर्यादा बनाए रखने की जिम्मेदारी अक्सर वकील के कंधों पर ही आ जाती है।
यह पूरा घटनाक्रम न सिर्फ अदालत की अनुशासनप्रियता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि सुप्रीम कोर्ट में धैर्य की भी एक सीमा होती है।
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