आज मन्ना डे की पुण्यतिथि: हिंदी सिनेमा के शास्त्रीय संगीत के बादशाह को याद कर रहा देश

Oct 24, 2025 - 15:37
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आज मन्ना डे की पुण्यतिथि: हिंदी सिनेमा के शास्त्रीय संगीत के बादशाह को याद कर रहा देश

नई दिल्ली (आरएनआई) भारतीय सिनेमा के सबसे बहुमुखी और प्रतिष्ठित पार्श्व गायकों में से एक, मन्ना डे को आज उनकी पुण्यतिथि पर पूरा देश याद कर रहा है। 'ऐ मेरी जोहरा जबीं', 'लागा चुनरी में दाग' और 'यारी है ईमान मेरा' जैसे गीतों को अमर करने वाले मन्ना डे ने अपनी शास्त्रीय गायकी और बहुआयामी प्रतिभा से संगीत जगत में एक अमिट छाप छोड़ी।

शास्त्रीय संगीत के 'बादशाह'
1 मई, 1919 को कोलकाता में जन्मे प्रबोध चंद्र डे (मन्ना डे) को अक्सर हिंदी सिनेमा के 'गोल्डन एरा' की तिकड़ी (मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, और मुकेश) के चौथे स्तंभ के रूप में देखा जाता था। हालांकि, संगीतकार और आलोचक उन्हें एक ऐसे 'विशेषज्ञ' गायक के रूप में मानते थे, जो सबसे मुश्किल और शास्त्रीय धुनों को बड़ी सहजता से गा सकते थे।

मोहम्मद रफ़ी भी थे मुरीद: एक मशहूर किस्सा है कि मोहम्मद रफ़ी ने एक बार कहा था, “लोग मेरे गाने सुनते हैं, लेकिन यदि मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूंगा कि मैं मन्ना डे के गीतों को ही सुनता हूं।”

अद्वितीय बहुमुखी प्रतिभा: उन्होंने अपने करियर में 4000 से अधिक गाने गाए, जिनमें हिंदी, बंगाली, मराठी, मलयालम और गुजराती सहित कई भाषाएँ शामिल हैं। उनकी आवाज़ का जादू केवल गंभीर शास्त्रीय गीतों तक सीमित नहीं था, बल्कि 'एक चतुर नार' और 'चुनरी संभाल गोरी' जैसे हल्के-फुल्के और हास्य गीतों में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी।

अमर कृति 'मधुशाला': महान हिंदी कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति 'मधुशाला' को स्वर देने के लिए मन्ना डे को ही चुना था, जो साहित्य और संगीत का एक अनूठा संगम बन गया।

संघर्ष और सम्मान
अपने चाचा, प्रसिद्ध संगीतकार कृष्ण चंद्र डे से संगीत की शुरुआती शिक्षा प्राप्त करने के बाद, मन्ना डे 1942 में मुंबई आए। उन्हें शुरुआत में धार्मिक फिल्मों के गायक का ठप्पा मिला, लेकिन उन्होंने अपनी प्रतिभा के दम पर इसे तोड़ा।

उनके करियर की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल हैं:

पद्म श्री (1971)

पद्म भूषण (2005)

दादासाहेब फाल्के पुरस्कार (2007)

एक दुखद विदाई
संगीत की दुनिया का यह नायाब सितारा 24 अक्टूबर 2013 को 94 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह गया।

आज भी, जब उनके सदाबहार गीत कानों में पड़ते हैं, तो उनकी आवाज़ की गहराई और भावनाओं की स्पष्टता श्रोताओं के दिलों को छू लेती है। मन्ना डे भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका संगीत हमेशा 'सुर का सागर' बनकर गूंजता रहेगा।

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