गुना न्यायालय स्थानांतरण विवाद: कलेक्टर के नहीं आने पर वकीलों ने स्वान के माध्यम से सौंपा ज्ञापन, जनहित में स्थानांतरण के खिलाफ उग्र प्रदर्शन
गुना (आरएनआई) आज अधिवक्ताओं ने विरोध में रैली निकालते हुए कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपने पहुंचे,लेकिन लगभग दो घंटे तक कलेक्टर नहीं आए। अधिवक्ताओं ने जिला प्रशासन ओर व्यवस्था के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और हनुमान चौराहे पर चारों सड़क को घेरकर जाम लगाकर हठधर्मिता के खिलाफ नारेवाजी की।कलेक्टर के फिर भी न आने पर गुस्साए वकीलों ने एक स्वान के गले मे कलेक्टर गुना की तफ्ती डालकर उसे ज्ञापन सौंपा।
बता दे कि मध्य प्रदेश के गुना शहर में वर्तमान में स्थित न्यायालय परिसर, तहसील एसडीएम कार्यालय और कलेक्टर कार्यालय एक ऐसी जगह पर हैं, जिसे वर्षों से स्थानीय जनता ने सहज, सुलभ और सर्वसुविधायुक्त माना है। यह क्षेत्र न सिर्फ मुख्य बाजार के मध्य स्थित है बल्कि यहाँ आने-जाने में आम नागरिकों, वकीलों, कर्मचारियों, दिव्यांगों और वृद्धजनों को कोई असुविधा नहीं होती। ना ही यहाँ जगह की कोई कमी है और ना ही ट्रैफिक की कोई उल्लेखनीय समस्या है।
इसके बावजूद हाल ही में इन जिला न्यायालय को शहर से चार-पाँच किलोमीटर दूर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव सामने आना कई प्रश्न खड़े कर रहा है। यह मुद्दा अब केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गया, बल्कि आम जनता, अधिवक्ता संघ और शहर के बुद्धिजीवी वर्ग के बीच गंभीर चिंता और आक्रोश का विषय बन चुका है।
गुना जिले के अधिवक्ताओं ने इस निर्णय का कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। उनका साफ कहना है कि जब मौजूदा स्थान पर कोई दिक्कत नहीं है, तो आखिर न्यायालय को दूरस्थ क्षेत्र में ले जाने की क्या आवश्यकता आन पड़ी..??? उनका यह भी तर्क है कि यह कदम न्याय की सुलभता को प्रभावित करेगा, विशेषकर गरीब और ग्रामीण परिवेश से आने वाले लोगों के लिए। आज भी कई नागरिक लंबी दूरी तय कर न्यायालय पहुँचते हैं। ऐसे में उन्हें और अधिक दूरी तय करने को मजबूर करना एक तरह से न्याय से वंचित करने जैसा कृत्य होगा।
स्थानीय चर्चाओं और अधिवक्ताओं के आरोपों के अनुसार यह निर्णय किसी सार्वजनिक हित से प्रेरित नहीं बल्कि कुछ लोगों को आर्थिक लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से लिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जिस क्षेत्र में न्यायालय परिसर और अन्य दफ्तरों को शिफ्ट करने की योजना है, वहाँ पहले ही कुछ रसूखदार लोगों ने भारी मात्रा में भूमि खरीदी है। यदि सरकारी संस्थानों का स्थानांतरण वहाँ होता है तो उन जमीनों की मार्केट वैल्यू कई गुना बढ़ जाएगी।
यह संदेह इसलिए भी प्रबल हो रहा है क्योंकि पहले भी पुराने बस स्टैंड की बेशकीमती जमीन को खाली कराकर कुछ गिने-चुने लोगों को लाभ पहुँचाने के आरोप लगे थे। अब उसी तर्ज पर न्यायालय जैसी संस्था को भी शहर के केंद्र से हटाकर दूर स्थापित करने की योजना सवालिया घेरे में है।
यदि इन आरोपों में थोड़ी भी सच्चाई है तो यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध होगा। सरकार और प्रशासन का दायित्व है कि ऐसे फैसलों में पारदर्शिता बरती जाए। न्यायालयों का स्थानांतरण कोई साधारण निर्णय नहीं होता। यह हजारों नागरिकों के जीवन को प्रभावित करता है। ऐसे में महज कुछ व्यक्तियों के लाभ के लिए सार्वजनिक संस्थाओं को शहर से बाहर भेजने की मंशा न केवल जनविरोधी है, बल्कि यह प्रशासन की नीयत पर गहरे प्रश्नचिह्न भी लगाती है।
यह स्पष्ट है कि यदि प्रशासन के पास स्थानांतरण का कोई ठोस, तार्किक और जनहितकारी कारण है, तो उसे सार्वजनिक रूप से सामने आना चाहिए। अगर यह निर्णय किसी नियोजित मास्टर प्लान का हिस्सा है, तो उसकी पूरी जानकारी शहरवासियों और अधिवक्ताओं को दी जानी चाहिए। लेकिन यदि यह केवल कुछ जमीन मालिकों को लाभ पहुँचाने की कवायद है, तो यह सरकार की छवि को गंभीर क्षति पहुँचा सकता है। लोकतंत्र में जनविश्वास सबसे बड़ा पूँजी होता है, और जनता के अधिकारों की अनदेखी करना किसी भी सरकार के लिए आत्मघाती हो सकता है।
गुना शहर के अधिवक्ताओं और नागरिकों का यह विरोध एक वैध और तर्कसंगत प्रतिरोध है। न्यायालय जैसी संस्थाओं की सुलभता को किसी भी परिस्थिति में बाधित नहीं किया जाना चाहिए। सरकार और प्रशासन से अपेक्षा है कि वे इस पूरे मुद्दे पर पारदर्शिता बरतें और हर आरोप व शंका का विस्तृत, तथ्यात्मक, सार्वजनिक और संतोषजनक उत्तर दें।
जनहित से बड़ा कोई हित नहीं हो सकता। यह सिद्धांत यदि प्रशासन भूल गया है, तो जनता के प्रतिरोध से ही उसे याद दिलाया जाएगा।
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