54 लाख का पैकेज छोड़, 24 वर्षीय इंजीनियर ने अपनाया वैराग्य – आंसुओं से भीग उठा अशोकनगर
अशोकनगर (आरएनआई) अशोकनगर का सुभाषगंज आज शाम एक ऐसे भावुक दृश्य का साक्षी बना जिसे शब्दों में पिरोना आसान नहीं है। विशाल पांडाल में बैठे हजारों लोग उस क्षण को देखकर अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख पाए, जब 24 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर पीयुष जैन ने संसार के मोह-माया, आकर्षण और भविष्य की सुनहरी राह छोड़कर वैराग्य का वरण किया।
पीयुष पुणे की एक प्रतिष्ठित कंपनी में कार्यरत थे, जहां उन्हें 54 लाख रुपए का पैकेज मिला था। मां-पिता ने बड़े अरमानों से उनका भविष्य संजोया था। मां श्रीमती सीमा जैन बेटे के विवाह के अरमान संजोए थीं। लेकिन जब पीयुष ने फोन कर कहा – “मां, मैं अब आपके सामने आपका बेटा नहीं, बल्कि श्रमण जीवन के पथिक के रूप में खड़ा रहूंगा” – तो मां का कलेजा चीर गया।
पिता श्री संजीव जैन भी अश्रुधारा रोक न पाए। मां की आंखों से बहते आंसू जैसे एक-एक श्रोता के दिल में उतर रहे थे। महिलाओं का रुदन उस क्षण को और अधिक मार्मिक बना रहा था– जैसे उनके अपने घर का लाल बिदा हो रहा हो। विदुषी युवतियां भाई को विदा करती बहनों की तरह सिसक रही थीं, और युवक भी अपने आंसुओं को छिपा नहीं सके। पूरा पांडाल संवेदना और श्रद्धा से भीग उठा। मुनिश्री ने कहा कि मां के यह आंसु एक दिन खुशी के आंसु बन जाएंगे।
उस क्षण, जब पीयुष ने संघ में प्रवेश किया, श्रमण शिरोमणि, निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने कहा – “मैंने इस बालक को बहुत डराया था। कहा था कि मोक्ष का मार्ग आसान नहीं है, यह तलवार की धार पर चलने के समान है। लेकिन इसने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया। जब संसार के बंधन ढीले पड़ते हैं, तब ही जीव इस कठिन पथ पर बढ़ता है। आज दशहरे जैसे शुभ दिन पर इसने वैराग्य को अपनाया, यह पूरे समाज का गौरव है।”
अब तक संघ में 17 ब्रह्मचारी शामिल हो चुके हैं। कोई एमडी डॉक्टर रहा, कोई सीए, कोई इंजीनियर, तो कोई आर्मी का सिपाही। और अब पीयुष… जिसने 54 लाख का चमकता करियर छोड़कर तप की कठिन राह चुनी।
यह दृश्य केवल एक युवक का निर्णय नहीं था – यह उन असंख्य परिवारों की भावनाओं का संगम था, जो अपने बच्चों को दुनिया में आगे बढ़ते देखना चाहते हैं, परंतु जब वही संतान संसार छोड़ मोक्ष की ओर कदम बढ़ा देती है, तो आंसुओं और गर्व का संगम बह निकलता है।
जिज्ञासा समाधान के प्रसिद्ध कार्यक्रम के बीच इस शाम पांडाल में कोई भी ऐसा नहीं था जिसकी आंखें सूखी रह गई हों। आंसुओं की नमी में वैराग्य की महिमा और त्याग का तेज का संदेश हैं।
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