भू-माफिया के सामने बौना हुआ सिस्टम, नियम सिर्फ गरीबों के लिए?
गुना (आरएनआई) सरकार को दो दिन पहले ही गुना के हनुमान चौराहे पर जो दृश्य देखने मिला, उसमें उस धारणा का प्रगटीकरण भी हुआ है, जो यहां के जनमानस में गहराई तक बैठ चुकी है। धारणा यह कि "गुना के भू माफिया कुछ भी कर और करवा सकते हैं। उनके सामने शासन प्रशासन सब बौने हैं और उनसे उपकृत हैं"! ऐसी कोई भी धारणा एक दिन में या किसी के उकसावे में या किसी एक घटना के कारण नहीं बनती।
आज शहर में कई जगह बाढ़ के हालात बन रहे हैं। इस शहर को बर्बाद कर खुद को आबाद करने के, और नेताओं और अधिकारियों को उपकृत करने के चर्चे जिन लोगों के नाम से चलते हैं वो शहर के भू माफिया ही हैं। जिन्होंने मोटी रकम कमाने के लिए चप्पे चप्पे पर अवैध बसाहट कर डाली। इन भू माफियाओं ने शहर की प्राकृतिक संरचना की सरेआम हत्या की। नाले पाट दिए, उन पर अतिक्रमण कर डाला, उनकी दिशा मोड़ दी, ड्रेनेज सिस्टम बर्बाद कर दिया। सरकारी जमीन घेरकर पार्क बना डाले। बेतरतीब बसाहट करते चले गए।ताज्जुब ये कि कुछ खिलाड़ियों ने तो ऐसा करने से पहले टाउन एंड कंट्री प्लानिंग से परमिशन भी ली।
इस कथित परमिशन की, भू माफिया द्वारा जमीन पर धज्जियां उड़ा दी जाती हैं। Collector Office Guna आप एक भी ऐसी कॉलोनी जिसकी शिकायत होने पर उसके टी एंड सीपी से अप्रूव होने और कथित वैध होने के प्रतिवेदन आपकी टेबल पर रखे जाते हैं, उनका खुद क्रॉस वेरिफिकेशन कर भौतिक सत्यापन करवा लीजिए, सारी असलियत सामने आ जाएगी।
टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के अफसर अपने हाथ बचाने के लिए परमिशन लेटर के आखिरी में एक लाइन लिख देते हैं कि "शर्त का उल्लंघन होने पर परमिशन निरस्त मानी जाएगी।" क्या ऐसा लिख देने से इन भ्रष्ट विभागों की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? सशर्त परमिशन की शर्तों का पालन भू माफिया कर रहा है या नहीं इसे देखने कौन जाता है? उल्लंघन होने पर कठोर कार्यवाही क्यों नहीं की जाती? क्यों भू माफिया पर एफआईआर के आदेश हाई कोर्ट से स्टे होने के बाद हवा हो जाते हैं? हाई कोर्ट में ऐसे प्रकरण विश्वसनीय पैरोकारों, जो भू माफिया के प्रभाव में न आएं उनसे डे टू डे फॉलो करवा कर अंजाम तक पहुंचाने की क्या व्यवस्था की गई है?
शहर की संरचना, जल निकास व्यवस्था और विकास को चौपट करने वाली अवैध कॉलोनियां आज भी कट रही हैं। उनमें परमिशन के बिना कच्ची पक्की अवैध सड़कें बनाई जा रही हैं। रजिस्ट्री हो रही हैं, एग्रीमेंट हो रहे हैं। विकास अनुज्ञा के बिना कॉलोनी नुमा संरचना बनाई जा रही हैं। क्या ये सब करना नियमों के प्रतिकूल नहीं है, अपराध नहीं है?
लेकिन क्या कार्यवाही हुई? कुछ नहीं।
प्रस्तावित नए न्यायालय कॉम्प्लेक्स के अगल बगल में ही देख लें। वहां बनी कथित वैध कॉलोनी की जांच यदि कानून की किताब और कॉलोनी विकास के नियम सामने रखकर कर ली जाए तो उसकी वैधता की असलियत सामने आ जाएगी। फिर अवैध कॉलोनियों का तो कहना ही क्या।
आज बाढ़ के हालात बने। क्या इन अवैध बसाहट में बाढ़ से प्रभावित नागरिकों के नुकसान की भरपाई के लिए संबंधित अवैध कॉलोनाइजर और जगह जगह अवैध पुलिया निर्माताओं के विरुद्ध पीड़ित नागरिकों को ओर से एक शिकायत लेकर इस आशय की एफआईआर क्यों दर्ज नहीं कराना चाहिए, कि उन्हें धोखे में रखकर अवैध कॉलोनी में प्लॉट बेचे गए जिनमें मकान बनाने से उनकी जान और माल को जोखिम उत्पन्न हुआ।
क्या इतनी इच्छा शक्ति दिखाई जाएगी कि समस्या पैदा करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही का लंबा अभियान छेड़ा जाए। जिसमें दोषी को भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा, कम्युनिस्ट के चश्मे से इतर सिर्फ कानून की निगाह से देखकर उनके कद को ज़रीब से नाप दिया जाए।
... और सरकार आप भी पुलिस प्रशासन को लेकर,,,
तुमको तीर भी चलाना है।
पर मेरे परिंदे भी बचाना है।।
वाली सोच से बाहर कब निकलेंगे? आपकी पुलिस और प्रशासन में इतनी ताकत है कि वो 24 घंटे में हर तरह के माफिया को चिमटे से पकड़ कर लटका दे। लेकिन जब उन्हें फ्री हैंड मिले तब तो वो ऐसा करें।
जब भी किसी अफसर ने अच्छी कार्यवाही की, गुना के अलग अलग गोरखधंधों के माफियाओं ने मोटी रकम इकट्ठा की और अलग अलग तरह से अलग अलग माई बाप की अगुवाई में आपको गुमराह ही किया। आपको गुमराह करने के कुछ आयोजन तक ऐसे करा दिए गए जिनमें शहर को बर्बाद कर रहे इन भू माफियाओं ने माइक से खुद को पीड़ित प्रताड़ित होने का रोना तक रोया। सब कुछ प्री प्लांड था। इनके घड़ियाली आंसू देखकर नर्माई बरतने की इच्छा जाहिर करना भी इनको ताकत देना ही है।
सरकार, जब जब माफिया के विरुद्ध प्रशासन ने कोई भी अभियान चलाया है आम जनता ने सराहना ही की है। ऐसे अभियानों और अफसरों की शिकायत लेकर आने वाले लोग जनसेवक या जनहितरक्षक नहीं हो सकते बल्कि माफिया के एजेंट ही होते हैं जो इनके संरक्षण के एवज में मोटी रकम लेते हैं। इसलिए आरोप भी लगते हैं
गुना में जब जब भू माफिया ने जल, जंगल, जमीन की हत्या की है तब तब इनके पहरेदारों ने भी उस हत्या को छुपाने के कुकर्म में अपना हिस्सा लिया है। कुछ नेताओं को तो भू माफिया पार्टनर ही इसलिए बनाते हैं कि वो विरोध न करें। माफिया यानी अवैध गतिविधि चलाने वाला गिरोह। अब इन गिरोहों पर कार्यवाही होना चाहिए, बिना पक्षपात, बिना भेदभाव के। ये समय की मांग भी है और रूल ऑफ लॉ लागू करने के लिए इसकी दरकार भी है।
Follow RNI News Channel on WhatsApp: https://whatsapp.com/channel/0029VaBPp7rK5cD6X
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Angry
0
Sad
0
Wow
0



