नेपाल में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए चीन के साथ हुए कई पुराने समझौतों की व्यापक समीक्षा शुरू कर दी है। साथ ही स्पष्ट कर दिया गया है कि जब तक इन परियोजनाओं की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी भी नए समझौते पर विचार नहीं किया जाएगा।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब हाल के वर्षों में नेपाल में चीन की बढ़ती भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च एंड रिजोल्यूशन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आर्थिक सहयोग के नाम पर चीन की मौजूदगी अब रणनीतिक और राजनीतिक प्रभाव तक पहुंच चुकी है।
पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में चीन के साथ कई बड़े समझौते किए गए थे, जिन्हें नेपाल की आर्थिक प्रगति और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए अहम बताया गया था। हालांकि, अब नई सरकार इन परियोजनाओं की स्थिति की जांच कर रही है, क्योंकि इनमें से कई प्रोजेक्ट या तो अधूरे हैं, या फिर लंबे समय से ठप पड़े हैं।
इनमें बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना, केरंग-काठमांडू रेलवे प्रोजेक्ट और ट्रांस-हिमालयी कनेक्टिविटी नेटवर्क जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएं शामिल हैं, जो अभी तक अपेक्षित प्रगति नहीं कर पाई हैं। इसके अलावा सीमा पार ट्रांसमिशन लाइन, रसुवागढ़ी-केरंग बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर और उत्तरी राजमार्ग कनेक्टिविटी जैसे कई प्रोजेक्ट भी अधूरे हैं या धीमी गति से चल रहे हैं।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि हुआवेई और जेडटीई से जुड़े डिजिटल विस्तार के प्रयास भी पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं, जिससे इन परियोजनाओं के रणनीतिक प्रभाव को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
नेपाल-चीन संबंधों में 2016 से 2018 के बीच तब तेजी आई थी, जब नेपाल ने बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) के तहत कई समझौते किए थे। लेकिन अब नई सरकार इन सभी पहलुओं की गहराई से जांच कर यह सुनिश्चित करना चाहती है कि देश के हितों के अनुरूप ही आगे की रणनीति तय की जाए।
इस कदम को नेपाल की नई नीति के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें वह विदेशी निवेश और परियोजनाओं को लेकर अधिक सतर्क और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।