गंदे नालों में भगवान? अतिक्रमण की आड़ में धर्म का दुरुपयोग
गुना (आरएनआई) भगवान से भीख मांगकर मकान बनाने वाला इंसान, मकान बनाकर उसी मकान में भगवान को बाथरूम से भी छोटी जगह देता है। चलो यहां तक तो ठीक है कम से कम देता तो है। लेकिन अतिक्रमण की गरज से गंदे नाले में भगवान को बिठाना और वहां मंदिरनुमा आकृति बना देना, इंसानी स्वार्थ का निकृष्टतम नमूना होता है।
आपको ऐसे कई धर्म प्रेमी मिल जाएंगे जिनका धर्म सरकारी जमीन, नदी नालों के किनारे की खुली जमीन देखकर जाग जाता है, और उस पर कब्जा करने की नियत से वहां भगवान, गौण बब्बा, मज़ार, दरगाह, देवताओं का चबूतरा बना देते हैं। ऐसे ढिंढोलची धर्मालुओं को चंदा उगाकर सरकारी जमीन घेरने के लिए भगवान की आड़ लेने की क्या जरूरत। यदि भक्ति वाकई मन में कुलांचे मारती है, तो खुद की जमीन पर या जमीन खरीदकर मंदिर बनाओ, किसने रोका है।
लेकिन नहीं, अतिक्रमण करना है। इसके लिए बेशर्म लोग तर्क भी देते हैं, कि हम भक्त हैं, अपने लिए थोड़ी न अतिक्रमण कर रहे हैं, समाज के भले के लिए कर रहे हैं। अरे भाई तो तुमसे भगवान ने कहा है क्या कि सरकारी जमीन गैर कानूनी ढंग से घेर कर मुझे बैठा दो? या गंदे गटर के नालों में कब्जा करने के लिए मेरा चबूतरा बना दो? फिर भले ही बाढ़ आए, जनहानि हो जाए!! अतिक्रमण से कौन से समाज का भला होता है? अरे गैर कानूनी चबूतरों और मंदिरों में तो मेरा भगवान भी रहना पसंद नहीं करेगा।
इसलिए Collector Office Guna द्वारा अतिक्रमण की नियत से किए जाने वाले ऐसे सारे अवैध निर्माण भी स-सम्मान हटाने या स्थान परिवर्तन की व्यवस्था की जाए। इसमें धार्मिक और सामाजिक संगठन भी मदद करें। ध्यान में आता है कि बिना अनुमति के अतिक्रमण की नियत से कहीं भी धार्मिक स्थलनुमा संरचना बना दी जाती हैं जो कई बार विवाद की जड़ बनती है।
अब इस लेख के लिए, जिसे मुझे कोसना है कोसता रहे। मेरा भगवान मुझे देख रहा है और गलत नियत से नालों में चबूतरे बनाने वालों को भी भगवान देख रहा है। लोकहित सर्वोपरि, सही को सही कहना भी धर्माचरण है।
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