भगवान काल भैरव: शिव के उग्र स्वरूप की अनूठी अभिव्यक्ति
(श्री कपाली बाबा)
वाराणसी (आरएनआई) काशी के अधिष्ठाता भगवान काल भैरव को अत्यंत उग्र और महान शक्तिशाली देवता के रूप में पूजा जाता है। भगवान शिव के अंश स्वरूप माने जाने वाले काल भैरव को “काशी के कोतवाल” कहा जाता है, जिनके बिना वहां कोई भी साधना या पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। शिव के आठ भैरव रूपों में काल भैरव प्रमुख हैं और इन्हें भगवान शिव की तांडव शक्ति का प्रतीक माना गया है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान काल भैरव की उपासना से पापों का नाश होता है और ग्रह दोषों से मुक्ति मिलती है। इन्हें तंत्र साधना और अघोर परंपरा का अधिपति माना गया है। काशी, उज्जैन, और अन्य पवित्र स्थलों में काल भैरव की उपासना विशेष रूप से की जाती है। कहा जाता है कि काल भैरव जहां स्थापित होते हैं, वहां यमराज का शासन नहीं चलता।
भक्तों की आस्था है कि भगवान काल भैरव के दर्शन मात्र से भी अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। इनके स्वरूप की पूजा विशेषकर मध्यरात्रि या रात्रिकालीन समय में की जाती है। काशी में स्थित काल भैरव मंदिर में श्रद्धालु तेल, काला वस्त्र, और शराब का चढ़ावा अर्पित करते हैं, जो तंत्र साधना की परंपरा से जुड़ा हुआ है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान शिव के भैरव रूप की उपासना से राहु-केतु दोष, काल सर्प योग, राज्य विवाद, वाद-विवाद और अन्य ग्रह बाधाओं से मुक्ति मिलती है। कहा गया है कि भैरव साधना करने वाले साधक को अष्ट सिद्धि और नव निधियों की प्राप्ति होती है।
काशी के अतिरिक्त उज्जैन में भी भगवान काल भैरव का भव्य मंदिर है, जिसे महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। यहां पर काल भैरव को महाकाल के रूप में पूजित किया जाता है और मंदिर परिसर में शराब का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा भी प्रचलित है।
भारतीय संस्कृति में काल भैरव का महत्व केवल एक धार्मिक प्रतीक के रूप में ही नहीं, बल्कि सामाजिक और दार्शनिक अर्थों में भी गहरा है। यह शिव के उस स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सृष्टि के संतुलन और अधर्म के नाश के लिए प्रकट होते हैं।
अंत में यह मान्यता गहराई से निहित है कि –
“वाराणस्यां भैरवो देव: संसार भय नाशनम्।
अनेक जन्म कृतं पापं दर्शनात् विनश्यति॥
ॐ नमः शिवाय॥”
भगवान काल भैरव की यह उपासना आज भी आस्था, श्रद्धा और तांत्रिक परंपरा का जीवंत प्रतीक बनी हुई है।
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