स्वतंत्रता दिवस पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की जवाबदेही पर उठे सवाल, राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट ध्वजारोहण की मांग
शैलेंद्र बिरानी
नई दिल्ली (आरएनआई) स्वतंत्रता दिवस नजदीक आने के साथ ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—मीडिया—की भूमिका, संवैधानिक दर्जा और जिम्मेदारी को लेकर नई बहस छिड़ गई है। विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया के लिए संविधान में कोई निश्चित प्रावधान नहीं है, उसी तरह मीडिया को भी कोई संवैधानिक चेहरा और जवाबदेही वाला दर्जा नहीं दिया गया है।
हाल के दिनों में यह मुद्दा तेजी से देशभर के पत्रकारों, मीडिया पेशेवरों और संगठनों तक पहुंचा है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपे गए हैं, सार्वजनिक मंचों पर मांग उठाई जा रही है और न्यायपालिका को भी इस पर संज्ञान लेने के लिए पत्र लिखे जा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि संवैधानिक दर्जा सिर्फ अधिकार नहीं देता, बल्कि उसके साथ जिम्मेदारियां भी आती हैं। राष्ट्रीय ध्वज और अशोक स्तंभ जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल करना आसान है, लेकिन संविधान और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए ईमानदारी से काम करना सबसे बड़ी देशभक्ति है।
मीडिया की असली राष्ट्रभक्ति सिर्फ खबरें दिखाने में नहीं, बल्कि उन्हें व्यवस्था और कानून से जोड़कर जनता को न्याय दिलाने तक पहुंचाने में है।
इस स्वतंत्रता दिवस पर एक नई पहल का आह्वान किया गया है—पूरे देश के मीडिया संस्थानों को एक साथ, सुबह 7 बजे, अपने-अपने कार्यालयों पर ध्वजारोहण कर ऑनलाइन माध्यम से जुड़ना और राष्ट्रगान के साथ शहीदों को श्रद्धांजलि देना। भविष्य में इसे राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर भी अपनाने की योजना है, ताकि उन पत्रकारों को सम्मान दिया जा सके जिन्होंने देश के लिए काम करते हुए अपनी जान गंवाई।
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