सुप्रीम कोर्ट की नसीहत: स्वतंत्रता में कटौती नहीं, हमेशा उसके पक्ष में झुकें

सुप्रीम कोर्ट ने एसडीपीआई नेता केएस शान हत्या मामले में आरएसएस के पांच आरोपियों की रद्द की गई जमानत को बहाल कर दिया। अदालत ने कहा कि स्वतंत्रता में कटौती के बजाय उसका समर्थन करना बेहतर है। दो साल से जमानत पर रहे आरोपियों ने कोई शर्त नहीं तोड़ी, इसलिए जमानत रद्द करना उचित नहीं।

Sep 23, 2025 - 11:57
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सुप्रीम कोर्ट की नसीहत: स्वतंत्रता में कटौती नहीं, हमेशा उसके पक्ष में झुकें

नई दिल्ली (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह स्वतंत्रता में कटौती के बजाय उसके पक्ष में झुकना पसंद करता है। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें एसडीपीआई के राज्य सचिव केएस शान की हत्या से संबंधित एक मामले में आरएसएस के पांच सदस्यों को दी गई जमानत रद्द कर दी गई थी। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने नोट किया कि आरोपी अपीलकर्ता दो साल से जमानत पर थे और राहत मिलने के बाद वे किसी भी समान या अन्य अपराध में शामिल नहीं रहे हैं। अदालत ने कहा कि इस मामले में 141 गवाह हैं और मुकदमे को पूरा होने में समय लगेगा।

पीठ ने कहा, हम स्वतंत्रता में कटौती की बजाय उसके पक्ष में झुकना पसंद करते हैं। उन्होंने जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर की ओर से प्रतिपादित जमानत न्यायशास्त्र के स्वर्णिम नियम, जमानत नियम है और जेल अपवाद, पर जोर दिया। पीठ ने कहा, इस सिद्धांत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने बताया कि जमानत रद्द करना, जमानत देने वाले आदेश को रद्द करने से अलग है।

पीठ ने कहा है, जमानत तब रद्द की जा सकती है जब अभियुक्त लगाई गई किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है। दूसरी ओर, जमानत देने का आदेश तब रद्द किया जा सकता है जब ऐसा आदेश विकृत या अवैध पाया जाता है। इस मामले में दिसंबर, 2022 में विभिन्न आदेशों के तहत निचली अदालत से जमानत पाए 10 आरोपियों में से हाईकोर्ट ने 18 दिसंबर, 2021 को राजनीतिक दुश्मनी के कारण हत्या में कथित रूप से शामिल होने के आरोप में पांच आरोपियों अभिमन्यु, अतुल, सानंद, विष्णु और धनीश की जमानत रद्द कर दी।

हाईकोर्ट में केरल सरकार ने तर्क दिया था कि जमानत मिलने के बाद एक अपीलकर्ता और एक अन्य सह-आरोपी, एक व्यक्ति पर हमले में शामिल थे। सरकार ने अपनी स्थिति रिपोर्ट में अपीलकर्ताओं के आपराधिक इतिहास का भी हवाला दिया। हालांकि शीर्ष अदालत ने कहा, रिकॉर्ड से पता चलता है कि शिकायतकर्ता (राज्य सरकार) ने हाईकोर्ट के समक्ष एक हलफनामा दायर कर अपीलकर्ता विष्णु की संलिप्तता से इन्कार किया था।

पीठ ने कहा है, बयान पर गौर करने से यह दर्ज करना पर्याप्त है कि जो दिख रहा है उससे कहीं अधिक है। पीठ ने कहा, हम इस तर्क को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि प्राथमिकी विष्णु को दी गई जमानत रद्द करने का आधार बनती है। स्थिति रिपोर्ट के संबंध में पीठ ने एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे पूर्व इतिहास अपने आप में जमानत से इन्कार करने का आधार नहीं बन सकते।

इस मामले में शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट से जमानत आदेश रद्द होने का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्र न्यायालय ने केवल दो बातों को ध्यान में रखा। पहला, हिरासत की अवधि और दूसरा, अभियोजन पक्ष की ओर से कोई विरोध नहीं। ऐसी परिस्थितियों में हाईकोर्ट के लिए सत्र न्यायालय को सभी प्रासंगिक कारकों पर विचार करने और अपीलकर्ताओं की जमानत याचिका पर नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश देना उचित और न्यायसंगत होता।

पीठ ने यह भी कहा कि अभियुक्तों के गवाहों को प्रभावित करने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की आशंका और मुकदमे की सुचारू प्रगति सुनिश्चित करने के लिए, उन शर्तों के अलावा और भी कठोर शर्तें लगाया जा सकता था। अपने फैसले में अदालत ने अपीलकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे साक्ष्यों से छेड़छाड़ न करें और गवाहों को डराने-धमकाने का प्रयास न करें।

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