रक्तरंजित बमौरी: वोटबैंक की राजनीति ने जंगलों की आग को बनाया संघर्ष की चिंगारी

Sep 10, 2025 - 14:41
Sep 10, 2025 - 14:42
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रक्तरंजित बमौरी: वोटबैंक की राजनीति ने जंगलों की आग को बनाया संघर्ष की चिंगारी

गुना (आरएनआई) छाती में धंसा ये तीर वोट की राजनीति से मिली हवा से इलाके में आई निरंकुशता के कारण लगा है। गुना जिले के बमौरी इलाके में ऐसे "अराजक तीर" उड़ना उड़ाना अब आम है। बमौरी ही क्यों जिले के हर जंगल में अब जमीन की लड़ाई में से अधिकांश में फरसे, तीर कमान, लुहांगी, गोफन चल जाते हैं। यहां एक दशक पहले तक भी स्थिति इतनी भयावह नहीं थी। आदिवासी इलाकों में इंसान की कीमत तब ज़मीन से ज्यादा थी। आदिवासी समुदाय जंगल का रक्षक था।

लेकिन जब जब भी किसी समुदाय को सिर्फ वोट समझा गया तब तब परिणाम अच्छे नहीं आए। बमौरी के जंगल अंदर ही अंदर संघर्ष की आग में सुलग रहे हैं तो इसकी जड़ में वोट हैं। यह आग सिर्फ वोट के लिए लगाई गई, ये सोचे बिना कि जब ये आग दावानल बन उठेगी तब सबका नुकसान होगा। हर कोई अवैध की छूट और अवैधानिकता को संरक्षण देकर नेता बनना चाहता है। बमौरी के जंगल रोज बिना रुके कट रहे हैं। मप्र में अवैध रूप से जंगल काटने में चौथा स्थान गुना का है। गुना में 51 हजार हेक्टेयर भूमि पर अवैध कब्जे हैं। और गुना जिले में इस मामले में बमौरी फतेहगढ़ अव्वल है।

जंगल की जमीन को लेकर आए दिन झगड़े होते हैं, खून बहता है। इससे पहले नवंबर 2024 में फतेहगढ़ के पंहेंटी में भील बंजारों के बीच वन भूमि पर कब्जे को लेकर संघर्ष हुआ था। जिसमें दलसिंह भील की मौत हुई। इस मौत से आग फिर भड़की और भील समुदाय ने पंहेंटी गांव में हमला कर कई गाडियां, 12 मकान फूंके डाले थे। जुलाई 2024 में फतेहगढ़ के ही ग्राम विष्णुपुरा में लोधी दंपत्ति और मुस्लिम परिवार में जमीन के कब्जे को लेकर हुए विवाद ने सांप्रदायिक रूप लिया था। इससे पहले 2020 में ग्राम डोबरा और बीलखेडा गांव में भी मुस्लिम और भीलों में संघर्ष हुआ था, 14 लोग घायल हुए थे। इस बार भील और भिलाला आपस में रक्तरंजित हुए हैं।

इस विवाद के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? गुना में फॉरेस्ट डिपार्टमेंट है। लेकिन अफसर अपने कर्तव्य के स्थान पर नेताओं में निष्ठा रखते हैं। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि जंगल किन लोगों को काटने देना है और किन्हें नहीं काटने देना है, शायद अफसर इसकी ही निगरानी ही करते होंगे। दवाब पड़ने पर कार्यवाही भी सांकेतिक ही होती है।

मसलन, विष्णुपुरा में जब लोधी दंपत्ति का मुस्लिम परिवार से विवाद हुआ, फिर बवाल हुआ तो उसके कुछ दिनों बाद फॉरेस्ट डिपार्टमेंट ने कुछ कब्जे हटाने की कार्यवाही को बढ़ा चढ़ाकर प्रचारित कराया। लेकिन हकीकत यह है कि उक्त कार्यवाही केवल हिंदू संगठनों को मूर्ख बनाने तक ही सीमित रही। जंगल पर दुबारा जस के तस अतिक्रमण हो गए।

जब तक जंगलों की जमीनों पर राजनैतिक दखलंदाज़ी बंद नहीं होगी और सरकार, अतिक्रमणों को लेकर फॉरेस्ट, रेवेन्यू, पुलिस, एसएएफ का संयुक्त दल बनाकर नए अतिक्रमण को कठोरता से नहीं रोकेगी। दोषियों पर कठोर कार्यवाही नहीं करेगी। पुराने कब्जों को छुड़ाने की नीति नहीं बनाएगी तब तक ये आग सुलगती रहेगी।

पक्ष विपक्ष से लेकर हर नेता जंगल की जमीन पर कब्जे को मौन रहकर शह दे रहा है। आज तक किसी ने इन कब्जों को हटाने की मांग को लेकर कोई अभियान नहीं छेड़ा। अगर यही सब चलता रहा तो वोटबैंक की राजनीति इस क्षेत्र में एक दिन बड़े वर्ग संघर्ष को जन्म देगी। और तब सरकार डॉ मोहन यादव और ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी हालात काबू में करना मुश्किल होगा।

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