‘यौन उत्पीड़न के मामलों में संकीर्ण व्याख्या से कमजोर होगा कानून का उद्देश्य’, सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
नई दिल्ली (आरएनआई) कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि पॉश (यौन उत्पीड़न निवारण) कानून की संकीर्ण व्याख्या उसके सामाजिक कल्याणकारी उद्देश्यों को कमजोर कर देगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पीड़िता के विभाग में गठित आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) किसी दूसरे विभाग के कर्मचारी के खिलाफ भी शिकायत की सुनवाई कर सकती है।
शीर्ष अदालत एक आईआरएस अधिकारी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने आईसीसी द्वारा जारी नोटिस को चुनौती दी थी। यह नोटिस एक 2004 बैच की आईएएस अधिकारी की शिकायत के आधार पर जारी किया गया था। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि 15 मई, 2023 को आईआरएस अधिकारी ने कार्यस्थल पर उनका यौन उत्पीड़न किया। इस शिकायत को खाद्य और सार्वजनिक वितरण विभाग में गठित आईसीसी के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, जहाँ पीड़िता संयुक्त सचिव पद पर तैनात थीं।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की दो-न्यायाधीशीय पीठ ने कहा कि पॉश अधिनियम की धारा 11 में प्रयुक्त ‘जहां प्रतिवादी कर्मचारी है’ का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि शिकायत केवल प्रतिवादी के विभाग की आईसीसी ही सुने। अदालत ने कहा कि ऐसी संकीर्ण व्याख्या पीड़ित महिला को कई प्रक्रियात्मक और मनोवैज्ञानिक बाधाओं में धकेल देगी।
कोर्ट की ओर से की गई महत्वपूर्ण टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि शिकायत केवल आरोपी के विभाग की आईसीसी के समक्ष दर्ज कराने का प्रावधान लागू किया जाए, तो पीड़ित महिला को दूसरे विभाग में जाकर कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा। यह न केवल व्यावहारिक कठिनाइयाँ पैदा करेगा, बल्कि पीड़िता पर अतिरिक्त मानसिक बोझ भी डालेगा।
अदालत ने कहा कि जब पीड़िता के विभाग की आईसीसी पॉश अधिनियम के तहत तथ्य-खोज जांच कर रही हो, तो आरोपी के नियोक्ता की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह अधिनियम की धारा 19(एफ) के तहत जांच में पूरा सहयोग करे, चाहे विभाग कोई भी हो। उसे समिति को आवश्यक सूचनाएँ और सहयोग तुरंत उपलब्ध कराना होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
आईआरएस अधिकारी ने पहले केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी) में याचिका दायर कर आईसीसी नोटिस को चुनौती दी थी, लेकिन सीएटी ने याचिका खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, जिसने भी सीएटी के फैसले को बरकरार रखा। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहाँ अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि पॉश कानून की व्याख्या पीड़िता के हितों को प्राथमिकता के साथ की जानी चाहिए और इसकी संकीर्ण व्याख्या कानून के मकसद को नुकसान पहुंचाएगी।
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