‘मतदाता हितैषी है मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया’ — सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनावी राज्य बिहार में विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के चुनाव आयोग के 24 जून के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की।

Aug 13, 2025 - 16:03
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‘मतदाता हितैषी है मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया’ — सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

नई दिल्ली (आरएनआई) बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण के चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने फिर से सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में मतदाताओं से मांगे गए दस्तावेजों की संख्या 11 है, जबकि मतदाता सूची के सारांश पुनरीक्षण में 7 दस्तावेजों पर विचार किया जाता था। यह दर्शाता है कि यह मतदाता हितैषी है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए मतदाता के पास 11 दस्तावेजों का विकल्प है, जबकि पहले किए गए संक्षिप्त पुनरीक्षण में सात दस्तावेज मांगे गए थे, इससे यह साफ दिखता है कि प्रक्रिया मतदाताओं के लिए अनुकूल है।

इससे पहले न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने चुनावी राज्य बिहार में विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) कराने के चुनाव आयोग के 24 जून के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की इस दलील के बावजूद कि आधार को स्वीकार न करना अनुचित था, लेकिन अन्य दस्तावेजों के विकल्प भी दिए गए थे, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रक्रिया वास्तव में सबको साथ में लेकर चलने वाली है।

पीठ ने कहा, 'राज्य में पहले किए गए संक्षिप्त पुनरीक्षण में दस्तावेजों की संख्या सात थी और एसआईआर में यह 11 है, जो दिखाता है कि यह मतदाता के लिए ठीक या उचित है। हम आपकी दलीलों को समझते हैं कि आधार को स्वीकार न करना ठीक नहीं है, लेकिन दस्तावेजों की अधिक संख्या वास्तव में समावेशात्मक है।' शीर्ष अदालत ने कहा कि मतदाताओं को सूची में शामिल 11 दस्तावेजों में से कोई एक जमा करना जरूरी था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने इस बात से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि दस्तावेजों की संख्या भले ही ज्यादा हो, लेकिन उनका कवरेज सबसे कम है। उन्होंने मतदाताओं के पास पासपोर्ट की उपलब्धता का उदाहरण दिया। सिंघवी ने कहा कि बिहार में यह केवल एक से दो प्रतिशत है। राज्य में स्थायी निवासी प्रमाण पत्र देने का कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा, 'अगर हम बिहार की आबादी के पास दस्तावेजों की उपलब्धता देखें, तो पता चलता है कि कवरेज बहुत कम है।'

पीठ ने कहा कि राज्य में 36 लाख पासपोर्ट धारकों का कवरेज ठीक दिखाई देता है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा, 'अधिकतम कवरेज सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों से फीडबैक लेने के बाद आमतौर पर दस्तावेजों की सूची तैयार की जाती है।'

इससे पहले 12 अगस्त को शीर्ष अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में नागरिकों या गैर-नागरिकों को शामिल करना या बाहर करना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में है। कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के एसआईआर में आधार और मतदाता कार्ड को नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं करने के अपने रुख को दोहराया।

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