गुना पुलिसिंग पर फिर दिखा सख्ती का असर, एसपी अंकित सोनी ने बिगड़े हालात काबू में करने की शुरू की पहल
गुना (आरएनआई) 90 के दशक में गुना में एसपी हुए थे पवन देव। उनके किस्से सुनते थे कि वो अचानक बिना बताए अकेले ही कभी भी थाने चौकियों में पहुंच जाते थे, पीछे से उनका निजी स्टाफ पहुंचता था। "साहब" किसी भी भेष में कभी भी आ जाते हैं, इस बात का मैदानी अमले पर इतना प्रभाव था कि रात को भी थाना चौकी स्टाफ "होश" में रहता था। अचानक इंस्पेक्शन की यह परम्परा जब जब टूटी और जिले के एसपी दफ्तरी बनकर काम करते रहे तब तब मैदानी स्तर पर गड़बड़ियां होती रहीं।
पवन देव का कार्यकाल पुराना हो गया। नए लोगों को एसपी राहुल कुमार लोढ़ा का कार्यकाल जरूर याद होगा। उन्होंने भी सुधार की शुरुआत विभाग से ही की थी। अनुशासनहीनता और लापरवाही पर जीरो टॉलरेंस की नीति के चलते उन्होंने कुछ ही दिनों में विभाग को चुस्त दुरुस्त कर दिया था। फिर अपराध की जड़ पर काम शुरू कर बड़े बदमाशों की नाक में नकेल डाल दी थी। हालांकि कांग्रेस शासन में बदमाशों की लॉबी के दवाब में उनका तबादला कर दिया गया था। चर्चा चली थी कि अपराधियों ने चंदा इकट्ठा कर ट्रांसफर करवाया था।
एसपी लोढ़ा के ट्रांसफर के बाद, बीच का एक दौर फिर पुलिसिंग के लेबल को गिराने वाला रहा। आरोन में हिरण शिकार कांड जिस दौर में हुआ, उसकी तो बात ही अलग है। तब न केवल अपराधियों की तूती बोली, बल्कि लेनदेन के तमाम किस्से चर्चाओं में रहे। शिकार कांड में तीन पुलिसकर्मियों की शहादत और तीन शिकारियों को ऑन स्पॉट मृत्युदंड के पीछे की असल कहानियां भी मान बढ़ाने वाली तो नहीं थीं।
अब गुना को, एसपी के रूप में मिले डायरेक्ट आईपीएस अंकित सोनी से काफी उम्मीदें हैं। अप्रैल में गुना में ज्वाइन करने के बाद से अब तक चार महीनों के छोटे से कार्यकाल में जिले में संगठित अपराधों नशा तस्करी, हथियार तस्करी, ऑन लाइन गैंबलिंग, गैंगस्टर्स पर प्रभावी कार्यवाही से अंकुश लगा। वहीं विभाग में भी लापरवाही और भर्राशाही पर लगाम लगते साफ दिख रही है।
पिछले एक सप्ताह में जिले के अलग अलग थाना चौकियों से पुलिसकर्मियों के व्यवहार और कार्यप्रणाली को लेकर आई गंभीर शिकायतों पर एसपी अंकित सोनी ने खुद इंस्पेक्शन कर सख्त रुख अपनाते हुए दो एएसआई को सस्पेंड किया और एक प्रधान आरक्षक के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई। जाहिर है इन कार्यवाहियों से उन लोगों को पसीना आया होगा जो किसी तरह के राजनैतिक संरक्षण या अपनी पहुंच के मुगालते में रहते आए हैं। देशभक्ति और जनसेवा के लिए यदि फोर्स में अनुशासन, वर्दी के प्रति वफादारी और अफसर के प्रति ईमानदारी ही नहीं रही तो फिर क्या बचेगा।
इससे पहले "कटर" और जुआरियों सटोरियों के संरक्षक या पार्टनर जैसी इमेज बना चुके अधिकांश पुलिसकर्मियों के तबादले थानों से इधर उधर किए जा चुके हैं। इस सुधार के लिए डीजीपी एमपी कैलाश मकवाना द्वारा पीएचक्यू से जारी आदेशों के साथ साथ एसपी अंकित सोनी का बहुत कम समय में ही विभाग के कर्मियों और उनकी मॉडस ऑपरेंडी की डीप स्टडी कर लेना प्रशंसनीय है।
हालांकि, पारदियों से जिला मुख्यालय और आसपास के क्षेत्र में अंधेरी खिलवाने वाले तत्वों और बदमाशों पर अंकुश लगना अभी बाकी है। इसके लिए धरनावदा और फतेहगढ़ थानों को अपग्रेड कर टीआई रैंक का थाना करने की मांग जनता द्वारा लंबे समय से की रही है। उम्मीद है कि इस दिशा में भी कोई प्लान जरूर ही बन रहा होगा। फिलहाल एक लंबे अर्से बाद जिले को कोई ऐसा एसपी मिला है, जो बिगड़े हुए हालात को बदलने की कोशिश में है। और जो अपराध पर कार्यवाही के साथ साथ विभाग के ढीले पेंच भी कस रहा है।
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