लोकार्पण मंच से उठे और काल के साथ चल दिए डॉ. शम्भूनाथ
लखनऊ (आरएनआई) उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के निराला सभागार में रविवार को उस समय सन्नाटा छा गया जब वरिष्ठ साहित्यकार, विद्वान एवं पूर्व मुख्य सचिव डॉ. शम्भूनाथ ने मंच पर ही अंतिम सांस ली।
यह अवसर था लेखिका मनोरमा लाल के कर्ण पर आधारित उपन्यास ‘व्यथा कौन्तेय की’ के लोकार्पण समारोह का। मंच पर प्रदेश और नगर के तमाम दिग्गज साहित्यकार एवं विद्वान मौजूद थे। सभागार खचाखच भरा था और मुख्य अतिथि के रूप में शम्भूनाथ जी का सभी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।
लगभग पंद्रह मिनट देरी से जब वे पत्नी चंदा नाथ के साथ सभागार में पहुँचे तो तालियों से पूरा वातावरण गूंज उठा। लोकार्पण और स्वागत भाषणों के बाद जब उनकी बारी आई तो उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरुआत मृत्यु विषय से की। द प्रॉफेट पुस्तक और जीवन-मरण के दर्शन का उल्लेख करते हुए वे एक राजा और मृत्यु की कथा सुनाने लगे।
लेकिन कुछ ही क्षण बाद उनकी वाणी थम गई। वे धीरे-धीरे आगे झुकते हुए मंच पर रखी मेज पर सिर रख दिए। पास बैठी हिंदी संस्थान की संपादक डॉ. अमिता दुबे ने आवाज लगाई, पर कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। मौजूद डॉक्टरों ने तुरंत सीपीआर दिया और उन्हें सिविल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन ईसीजी पर सीधी लकीर आ चुकी थी। डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
साहित्य, प्रशासन और अकादमिक जगत में गहरी छाप छोड़ने वाले डॉ. शम्भूनाथ के इस तरह मंच पर ही मृत्यु का वरण करने से पूरा साहित्यिक समाज स्तब्ध रह गया।
सभा से उनके आवास विजयखंड, गोमतीनगर तक शोक की गहरी छाया फैल गई।
उनकी पत्नी चंदा नाथ और उपस्थित सभी साहित्यप्रेमी शून्य निगाहों से उस मंच को देखते रह गए जहाँ कुछ क्षण पहले तक वे मृत्यु पर बोल रहे थे और अब स्वयं उसी मृत्यु के साथ अनंत यात्रा पर निकल चुके थे।
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