पत्रकार आशीष सागर दीक्षित कोर्ट से बरी: साजिश रचने वालों पर चुप क्यों है मीडिया? उठने लगे सवाल

Jul 10, 2025 - 18:23
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पत्रकार आशीष सागर दीक्षित कोर्ट से बरी: साजिश रचने वालों पर चुप क्यों है मीडिया? उठने लगे सवाल

बाँदा (आरएनआई) पत्रकार, पर्यावरण योद्धा और सामाजिक सरोकारों से जुड़े आशीष सागर दीक्षित को बाँदा की विशेष एससी/एसटी अदालत ने सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है। यह फैसला उस समय आया है जब आशीष को लगभग दो वर्षों से झूठे और गंभीर आरोपों की कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी, जिसमें उन्हें 26 दिन की जेल भी भुगतनी पड़ी।

क्या था मामला?
31 मई 2022 को एक एनजीओ से जुड़ी महिला ने आशीष सागर पर दुर्व्यवहार, छेड़छाड़ और एससी/एसटी एक्ट के तहत गंभीर आरोप लगाए थे। इसके दो दिन बाद 2 जून को उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, हालांकि आशीष ने पहले ही गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट से स्थगन आदेश ले लिया था। बावजूद इसके, उन्हें जेल जाना पड़ा।

अब कोर्ट ने इन आरोपों को "साजिशन और प्रमाणहीन" मानते हुए उन्हें सभी धाराओं से बरी कर दिया है।

मीडिया की भूमिका पर सवाल
कोर्ट के इस स्पष्ट फैसले के बाद स्थानीय मीडिया, विशेषकर दैनिक अमर उजाला, की चुप्पी अब सवालों के घेरे में है। जिन अखबारों ने 2022 में गिरफ्तारी को प्रमुखता से छापा था, वे अब न्यायिक फैसले पर मौन हैं। पत्रकार और समाजसेवी जगत में यह चिंता गहराने लगी है कि जब आरोप लगते हैं, तो मीडिया व्यक्ति को अपराधी की तरह पेश करता है, लेकिन जब वह अदालत से बरी होता है, तो न्याय की खबर दबा दी जाती है।

"चिंगारी गैंग" और विद्याधाम समिति पर आरोप
स्थानीय सामाजिक संगठनों और नागरिक समाज के सदस्यों ने आरोप लगाया है कि इस पूरे मामले में विद्याधाम समिति और कथित “चिंगारी गैंग” जैसी संस्थाओं की भूमिका संदिग्ध रही है। लोगों का कहना है कि साजिश रचने वाले चेहरों को बचाने में पुलिस और मीडिया दोनों की भूमिका पक्षपाती रही।

क्या मीडिया साजिश में भागीदार?
पत्रकारिता के उसूलों में निष्पक्षता, न्याय और पारदर्शिता सर्वोपरि माने जाते हैं। लेकिन बाँदा में आशीष सागर के मामले ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मीडिया अब सिर्फ आरोप लगाने वालों का मंच बनकर रह गया है?
क्या किसी की छवि बिगाड़ने के बाद, जब सच्चाई सामने आए, तो मीडिया को जवाबदेह नहीं होना चाहिए?

स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि बाँदा की कुछ मीडिया संस्थाएं सत्ता और संगठनों की मिलीभगत से काम कर रही हैं। ये संस्थान न तो भ्रष्टाचार को उजागर करते हैं, न ही माफिया नेटवर्क की परतें खोलते हैं।

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