खाकी पर दाग: गुना और सिवनी में पुलिस भ्रष्टाचार के मामले उजागर, ईमानदार अफसरों की ताजगी बनी उम्मीद की किरण

Oct 12, 2025 - 15:04
Oct 12, 2025 - 15:37
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खाकी पर दाग: गुना और सिवनी में पुलिस भ्रष्टाचार के मामले उजागर, ईमानदार अफसरों की ताजगी बनी उम्मीद की किरण

गुना (आरएनआई) ये हैं डीएसपी पूजा पांडेय। सिवनी में पदस्थ थीं। आरोप है कि उन्होंने मुखबिर की पिन प्वाइंट सूचना पर कुछ विश्वस्त पुलिस वालों की साथ पहुंचकर जंगल के रास्ते में एक हवाला कारोबारी की कार रुकवाई। उसमें से 3 करोड़ रुपए निकाले। कागजों में जब्ती सिर्फ एक करोड़ 45 लाख रुपए की ही बताई। इतनी बड़ी राशि मिलने की सूचना तक अफसरों को नहीं दी और हवाला कारोबारी को छोड़ दिया। 

आरोप है कि "इसमें डेढ़ करोड़ मेरे डेढ़ करोड़ तुम्हारे।" कुछ इस तरह की डीलिंग हुई थी। कारोबारी अपनी पूरी रकम वापस चाहता था और 45 लाख रुपए देना चाहता था। लेकिन लूट के लिए वर्दी पहनने वालों की नज़र में 45 लाख भी कम थे। यदि 45 लाख में डील फाइनल हो जाती तो शायद ये किस्सा कभी उजागर ही नहीं होता। लेकिन लालच से बात बिगड़ गई। कारोबारी भी कर्रा था। वह अगले दिन अपने साथियों को लेकर पुलिस के खिलाफ लूट की एफआईआर लिखवाने थाने पहुंच गया। सो मामला खुल गया।

बात मीडिया में आ गई। अफसरों तक पहुंची। अखबार रंगने लगे। अफसरों ने जांच बिठाई और कथित लूट के इस खेल में शामिल थाना प्रभारी, आरक्षकों को निलंबित करने के बाद डीएसपी पूजा पांडेय को भी निलंबित कर दिया गया।

एक और घटना में भोपाल के पिपलानी में पुलिसकर्मियों पर मारपीट कर एक इंजीनियर की हत्या का आरोप लगा है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मृतक का पैंक्रियाज (जठर) फटने से मौत होने की पुष्टि हुई है। आरोप है कि इंजीनियर उदित गायकी अपने दोस्तों के साथ पार्टी कर रहा था। 

पुलिसकर्मियों ने उनसे दस हजार रुपए मांगे बदले में उन्होंने तीन हजार ऑफर किए लेकिन बात नहीं बनी। पुलिस से बचने के लिए उदित वहां से भागा तो दो आरक्षकों ने उसे पीट पीट कर मार डाला। पिटाई के सीसीटीवी सामने आए। हंगामा हुआ। पुलिस पर सवाल उठे तो सीएम डॉ मोहन यादव के निर्देश पर दोनों आरक्षकों पर हत्या का अपराध दर्ज कर उन्हें हिरासत में ले लिया गया।

पुलिस की वर्दी पर जब जब भी दाग लगते हैं तब तब जड़ में अवैध वसूली का एंगल जरूर निकल कर आता है। कस्टोडियल डेथ के मामलों में भी पिटाई का मकसद अनुचित हेतुक की पूर्ति करना रहता है, अपराध रोकना या अपराधी को सुधारना नहीं। मार से बचने पैसे लाओ। चोरी डकैती में से हिस्सा लाओ। जुआ के फड़ में से रकम लाओ। इस नियत के चलते विशेष रुचि आती है और मकसद पूरा न होने पर गुस्से में की गई बर्बरता जान ले लेती है। 

हालांकि इन हालातों का सामना उन्हें ही करना पड़ता है जो भ्रष्ट हैं, लालची हैं और वर्दी का दुरुपयोग करते हैं। जिनके लिए पुलिसिंग देशभक्ति जनसेवा न होकर अवैध तरीकों से कमाई का जरिया है। पुलिस को बदनाम करने वाले ऐसे तत्वों पर सरकार को कठोरतम कार्यवाही करना चाहिए। जिससे सरकार और पूरे महकमे की छवि खराब न हो।

प्रदेश खुश किस्मत है कि पुलिस के मुखिया डीजीपी कैलाश मकवाणा बेहद ईमानदार हैं। इस कारण खाकी पहन कर अवैध काम करने वाले बच नहीं रहे। दागदार मैदानी कर्मचारी और अफसर लगातार नापे जा रहे हैं। 

फिर भी कुछ घटनाओं से पूरे तंत्र के भ्रष्ट होने की धारणा बनती है, लेकिन ये भी सही है कि आज भी हर तंत्र में डेडली ऑनेस्ट लोग हैं। जिन्होंने तंत्र को बचा रखा है। गुना का ही उदाहरण लीजिए, यहां के ईमानदार अफसर ने मैदानी अमले को टाइट कर अपराध जगत में मातम का माहौल बना दिया है। ऐसे अफसर निराशा के स्याह अंधेरे में उम्मीद की किरण बनकर आते हैं। अन्यथा जनता को बगावत करने में देर कितनी लगे।

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