वृन्दावन कॉरीडोर: सरकार की मंजूरी बना प्रशासन की मुसीबत
वृन्दावन (आरएनआई) वृन्दावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर को लेकर प्रस्तावित कॉरिडोर निर्माण योजना अब शासन और प्रशासन के लिए गले की हड्डी बन चुकी है। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इस महत्वाकांक्षी योजना को हरी झंडी दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला अटक गया है, जिससे पूरे मथुरा-वृन्दावन क्षेत्र में आक्रोश की लहर फैल गई है।
सेवायत परिवार, महिला संगठन, स्थानीय व्यापारिक वर्ग और यहां तक कि सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर भी विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं। भाजपा की पूर्व जिलाध्यक्ष, मंदिर से जुड़े नेता और सेवायत परिवार की महिलाएं इस योजना के खिलाफ खुलकर सामने आ गई हैं। उनका कहना है कि यह कॉरिडोर मंदिर की परंपरा, आस्था और स्थानीय संस्कृति के साथ खिलवाड़ है।
वहीं दूसरी ओर, जिला प्रशासन और आगरा मंडल के वरिष्ठ अधिकारी सरकार की योजना को अमलीजामा पहनाने में जुटे हैं। प्रशासन द्वारा लोगों से जबरन सहमति पत्र भरवाने की शिकायतें सामने आई हैं। महिला संगठनों और व्यापारिक संगठनों के कुछ धड़े प्रशासन के दबाव में आकर कॉरिडोर के पक्ष में दस्तावेज तैयार करवा रहे हैं।
स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब मथुरा की सांसद ने खुलकर कॉरिडोर निर्माण का समर्थन किया। इसके बाद वृन्दावन की महिलाओं और सेवायतों ने उनका सार्वजनिक रूप से विरोध करना शुरू कर दिया। सेवायतों का कहना है कि जो नेता जनता की आवाज़ को अनसुना कर प्रशासन के इशारे पर काम कर रहे हैं, उन्हें आगामी चुनाव में सबक सिखाया जाएगा।
भाजपा के कई स्थानीय विधायक इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। उन्हें आशंका है कि वृन्दावन की जनता के विरोध के बीच बोलना उनके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है। इसके विपरीत, कुछ कथित ‘चाटुकार’ लोग प्रशासन को खुश करने के लिए सहमति पत्रों का खेल खेल रहे हैं, जिसे सेवायतों ने गंभीरता से लिया है और समय आने पर उनका विरोध करने की बात कही है।
सूत्रों के अनुसार, हाल ही में दो वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने एक बड़े संगठन के नेता से मिलकर आंदोलन रोकने की अपील की, लेकिन उस नेता ने इस तरह की किसी भी मुलाकात से इनकार किया है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या संगठन प्रशासन के दबाव में आता है या वृन्दावनवासियों के साथ खड़ा होता है।
गोस्वामी समाज और अन्य धार्मिक संगठनों का कहना है कि अब दूध का दूध और पानी का पानी होगा। नेता तय करें कि वे जनता के साथ हैं या सत्ता के।
कॉरिडोर निर्माण को लेकर संघर्ष और समर्थन की यह लड़ाई दिन-ब-दिन तेज़ होती जा रही है, और प्रशासन के लिए यह योजना अब संकट का विषय बन गई है।
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