राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष उत्सव में निकला बाल पथ संचलन, जगह-जगह पुष्प वर्षा कर हुआ स्वागत
गुना (आरएनआई) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने पर इसे शताब्दी वर्ष उत्सव के रुप में मनाया जा रहा है। इसके अतंर्गत कई कार्यक्रमों की आयोजन किया जा रहा है। इसी क्रम में मंगलवार को बाल पथ संचलन निकाला गया। संचलन के माध्यम से बाल स्वयंसेवकों ने राष्ट्र प्रेम, समर्पण और अनुशासन का संदेश दिया। संचलन में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में अनुशासनबद्ध तरीके से भाग लिया। इस दौरान घोष की ताल पर स्वयंसेवक कदमताल करते हुए निकले। संचलन का जगह-जगह पुष्प वर्षा कर स्वागत किया गया। इससे पहले बाल स्वयंसेवकों को मुख्य वक्ता के रुप में अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के मध्यक्षेत्र संगठन मंत्री अलंकार वशिष्ठ ने बौद्धिक प्रदान किया। इस दौरान मुख्य अतिथि गणमान्य नागरिक कपिल जैन रहे एवं अध्यक्षता नगर संघचालक महैन्द्र सिंह संधू ने की।
इन मार्गों से निकला संचलन
पथ संचलन शहर के प्रताप छात्रावास स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यालय से शुरु हुआ। यहां से संचलन हाट रोड नीचला बाजार, बताशा वाली गली, नई सडक़, अस्पताल मार्ग, लक्ष्मीगंज, सदर बाजार, सुगन चौराहा, नीचला बाजार, हाट रोड, जगदीश कॉलोनी एवं प्रताप छात्रावास मार्ग होते हुए वापस संघ कार्यालय पहुँचा।
संचलन में एक वाहन पर गुरुनानक देव जी एक तस्वीर के रुप में विराजित थे। संचलन के स्वागत के लिए लोग स्वप्रेरित होकर आगे आए।
पथ संचलन से पूर्व बाल स्वयंसेवकों को बौद्धिक प्रदान करते हुए ग्राहक पंचायत के मध्यक्षेत्र संगठन मंत्री अलंकार वशिष्ठ ने कहा कि परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने 100 साल पहले वर्ष 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। इसके बाद से संघ लगातार व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण के कार्य में रत है। अपनी 100 साल की इस यात्रा में संघ ने चार चरण देखे हैं, उपेक्षा, उपहास, विरोध ओर प्रतिबंध। इन सभी चरणों में संघ ने सफलता अर्जित कर राष्ट्र साधना की है। वशिष्ठ ने अपने उदबोधन में सिख धर्म के प्रथम गुरु नानकदेव जी का उल्लेख भी किया। उन्होने कहा कि गुरु नानक देव जी का जीवन बताता है कि हिन्दुओं का संगठित होना कितना आवश्यक है?
पंच परिवर्तन की दी जानकारी
वशिष्ठ ने संघ के पंच परिवर्तन की जानकारी देते हुए कहा कि शताब्दी वर्ष में संघ ने पंच परिवर्तन लागू किए है। जिनमें स्वदेशी, नागरिक कर्तव्यबोध, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन एवं पर्यावरण संरक्षण । इन पंच परिवर्तन पर अमल करके ही हम समाज और राष्ट्र का कल्याण कर सकते है। उन्होने कहा कि व्यक्ति सुधरेगा तो परिवार संस्कारित होगा, परिवार संस्कारित होगा तो समाज संगठित और संस्कारित होगा और जब समाज संस्कारित और संगठित होता तो वह संस्कारित राष्ट्र का निर्माण करेगा। उन्होने पंच परिवर्तन के पहले आयाम स्वदेशी के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि स्वदेशी आत्मनिर्भर भारत की नींव है। स्वदेशी अपनाकर हम आत्मनिर्भर भारत का संकल्प पूरा कर सकते है। स्वदेशी में देश के उद्योग,भाषा, ज्ञान और संस्कृति के प्रति गौरव का अुभवन करने के साथ ही स्थानीय उत्पादन का प्रोत्साहन देना शामिल है।
अधिकार के साथ कर्तव्य भी निभाए
उन्होने कहा कि नागरिक नागरिक कर्तव्यबोध का आशय अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन है। जब भी बात आती है हम अधिकार की बात तो करते है, किन्तु कर्तव्य को भूल जाते है। अनुशासन और राष्ट्र जीवन में सक्रिय सहभागिता भी नागरिक कर्तव्यबोध है, वहीं सामाजिक समरसता के माध्यम से हमे जाति-पंथ के भेद मिटाकर बंधुता, समानता और आत्मीयता का वातावरण स्थापित करना है। इसी तरह कुटुंब प्रबोधन में हमें परिवार को संस्कार और संवाद का प्रथम विद्यालय मानना, पारिवारिक संबंधों में सुदृढ़ता प्रदान करना है। परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। माता शिशु की प्रथम गुरु होती है। उन्होने पर्यावरण संरक्षण की जानकारी देते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण हम सबकी जिम्मेदारी है। पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वालीं सभी वस्तुओं का बहिष्कार हमें करना है और जल, वन, भूमि और वायु के प्रति संवेदनशीलता अपनानी है। इसके साथ ही प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और संतुलित जीवनशैली का पालन भी हमें करना चाहिए।
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