गंधमर्दन की गोद में बसे नरसिंहनाथ मंदिर में विराजते हैं ‘मार्जरा-केशरी’ भगवान, आस्था और इतिहास का अद्भुत संगम
(रमाशंकर श्रीवास्तव)
ओडिशा के बरगढ़ जिले में गंधमर्दन पहाड़ियों की तलहटी में स्थित प्राचीन नरसिंहनाथ मंदिर अपनी ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और वास्तुकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण धरोहर के रूप में प्रतिष्ठित है। 14वीं शताब्दी में पटनागढ़ के चौहान राजा बैजल देव द्वारा निर्मित यह मंदिर कलिंग वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसके मुख्य गर्भगृह, जगमोहन प्रार्थना कक्ष और नक्काशीदार स्तंभ इसकी भव्यता को दर्शाते हैं। मंदिर में स्थापित भगवान नरसिंह की प्रतिमा मार्जरा-केशरी रूप में है, जो बिल्ली की सुंदरता और शेर की शक्ति का अनूठा मिश्रण है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु ने मूषिका दैत्य का वध करने के लिए यह रूप धारण किया था।
यद्यपि मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में हुआ, यहाँ की पूजा परंपरा 9वीं शताब्दी से भी पुरानी मानी जाती है, जिसके प्रमाण मंदिर के भीतर स्थित प्राचीन स्तंभ देते हैं। यह पवित्र स्थल पापहारिणी नदी के उद्गम पर अवस्थित है और घने जंगलों, औषधीय पौधों तथा प्राकृतिक झरनों से घिरी गंधमर्दन पहाड़ियों में स्थित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यह वही पर्वत है जिसे हनुमान जी हिमालय से लाए थे। 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी गंधमर्दन पहाड़ी का उल्लेख बौद्ध शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में किया था।
यहाँ वैशाख माह में मनाया जाने वाला नृसिंह चतुर्दशी पर्व प्रमुख आकर्षण है, जिसे बड़ी धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। नरसिंहनाथ मंदिर केवल एक तीर्थस्थल ही नहीं है, बल्कि यहाँ प्राप्त शिलालेख ओडिया भाषा और लिपि के प्रारंभिक विकास को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं। यह स्थल धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य का संगम प्रस्तुत करता है।
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