किसान योजनाएँ या राजनीतिक रेवड़ियाँ — आखिर किस पर पड़ेगा आर्थिक बोझ?

Nov 3, 2025 - 20:57
Nov 3, 2025 - 21:08
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किसान योजनाएँ या राजनीतिक रेवड़ियाँ — आखिर किस पर पड़ेगा आर्थिक बोझ?

भोपाल (आरएनआई) — एक ओर किसान मक्का पर भावांतर योजना की माँग करते रह गए, वहीं दूसरी ओर सरकार अब गेहूं और धान की सरकारी खरीदी को ही बंद करने की तैयारी में है।

सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, गेहूं और धान की खरीदी से राज्य पर भारी आर्थिक बोझ बढ़ा है — और इसी आधार पर इस योजना को सीमित या समाप्त करने की चर्चा चल रही है।

परंतु सवाल यह है कि —
जब आर्थिक समीक्षा की बात हो रही है, तो सरकार उन तमाम “चुनावी रेवड़ियों” का भी मूल्यांकन क्यों नहीं करती, जो वोट की राजनीति के लिए वर्षों से बाँटी जा रही हैं और आज भी जारी हैं?

"रेवड़ियों" पर भी हो आर्थिक लेखा-जोखा
अर्थशास्त्र और वित्त के कई विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि ऐसी योजनाएँ राज्यों के लिए दीर्घकालिक रूप से वित्तीय रूप से नुकसानदेह हैं। लेकिन राजनीतिक लाभ-हानि की गणना, इन चेतावनियों पर गंभीर चर्चा तक नहीं होने देती। अगर सरकार गेहूं और धान खरीदी जैसी योजनाओं को "अर्थिक बोझ" बताकर रोकने पर विचार कर रही है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि विभिन्न डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) योजनाओं पर कितना खर्च होता है और उनसे राज्य की वित्तीय स्थिति पर क्या असर पड़ता है।

"फ्री स्कीम" से घटी श्रमशीलता?
आज गांवों में मजदूरों की कमी नई समस्या बन गई है। कई किसान बताते हैं कि कुछ साल पहले जहाँ आसानी से मजदूर मिल जाते थे, वहीं अब सरकारी योजनाओं के कारण श्रम उपलब्धता में कमी आई है। यह भी अध्ययन का विषय है कि “फ्री स्कीम” का असर कहीं ग्रामीण श्रमशक्ति की उत्पादकता पर तो नहीं पड़ रहा?क्योंकि किसी भी देश का विकास उसकी श्रमशक्ति पर निर्भर करता है। अगर यह शक्ति व्यक्तिगत स्तर पर कमजोर होती जाएगी, तो परिणामस्वरूप पूरा राष्ट्र एक कमजोर श्रम अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा।

"फ्री योजनाओं" की दिशा तय हो
यदि सरकारें अपने खजाने से मुफ्त योजनाएँ ही चलाना चाहती हैं,
तो उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि आपदा राहत जैसे क्षेत्रों तक सीमित रखना चाहिए —
जहाँ इसका वास्तविक सामाजिक प्रभाव पड़ता है।
कृषि क्षेत्र में भी यह सहायता केवल आपदाग्रस्त स्थितियों या फसल हानि पर दी जानी चाहिए,
न कि स्थायी सब्सिडी के रूप में।

जहाँ तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की बात है,
सरकार को फसल के मानकों के अनुसार दाम तय कर
मंडियों में उसकी न्यायसंगत बिक्री सुनिश्चित करनी चाहिए,
ताकि किसान को स्थिर बाजार मिले और सरकारी बोझ भी संतुलित रहे।

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