हिंदी दिवस : भाषा, संस्कृति और आत्मगौरव का प्रतीक

Sep 14, 2025 - 10:55
Sep 14, 2025 - 10:55
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हिंदी दिवस : भाषा, संस्कृति और आत्मगौरव का प्रतीक

हरदोई (आरएनआई) हर राष्ट्र की आत्मा उसकी मातृभाषा होती है। जिस राष्ट्र की अपनी भाषा नहीं होती, वह मानो गूंगा और बहरा हो जाता है। भाषा ही संस्कृति की आधारशिला है। भारत के लिए यह गर्व की बात है कि हमारे पास हिन्दी जैसी समृद्ध, सहज और लोकजीवन में रची-बसी भाषा है। यही कारण है कि हजारों वर्षों से हमारी सभ्यता और संस्कृति का अस्तित्व बना हुआ है।

इतिहास बताता है कि विदेशी आक्रांताओं ने न केवल हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता छीनी बल्कि हमारी भाषायी और सांस्कृतिक संपदा को भी क्षति पहुँचाई। परिणामस्वरूप हम अपने स्वर्णिम अतीत और भाषायी गौरव को भूलने लगे। हिंदी दिवस हमें यही याद दिलाता है कि हमारी भाषा और संस्कृति को सहेजने की जिम्मेदारी हमारी ही है।

संविधान में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है, परन्तु हमारी सोच और व्यवहार में कहीं न कहीं हिंदी के प्रति हीनभावना झलकती है। हम उधार की भाषा में अपना सामाजिक स्तर बनाने की कोशिश करते हैं। जब तक यह मानसिकता बनी रहेगी, तब तक हिंदी दिवस केवल मंचों और भाषणों तक सीमित रहेगा।

आज विकसित राष्ट्र जैसे जापान, रूस और चीन विज्ञान व तकनीक के सभी विषय अपनी भाषा में पढ़ाते हैं। यही आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव का मार्ग है। भारत को भी यही दृष्टिकोण अपनाना होगा।

हिंदी दिवस का सच्चा अर्थ यही है कि हम हिंदी को केवल बोलने या पढ़ने की भाषा न मानकर, उसे अपने ज्ञान, तकनीक, प्रशासन और व्यवहार में शामिल करें। हमें अपनी कथनी और करनी में एकरूपता लानी होगी। तभी हिंदी का वास्तविक सम्मान, संरक्षण और विकास संभव होगा।

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Laxmi Kant Pathak Senior Journalist | State Secretary, U.P. Working Journalists Union (Regd.)