पदस्थापना और भ्रष्टाचार पर सवाल पूछने पर औद्योगिक विकास मंत्री नंदी भड़के, पत्रकार को बताया ‘ब्लैकमेलर’

Jul 5, 2025 - 13:45
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लखनऊ (आरएनआई) उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास विभाग में पदस्थापना, पदोन्नति और कथित भ्रष्टाचार को लेकर उठते सवालों के बीच एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। जब ‘यूपी की बात’ चैनल के एडिटर इन चीफ एवं सीईओ आर.सी. भट्ट ने मंत्री नंद गोपाल गुप्ता 'नंदी' से सवाल किए, तो मंत्री असहज हो उठे और पत्रकार को “ब्लैकमेलर” कह डाला।

मामला तब तूल पकड़ गया जब आर.सी. भट्ट ने विभाग में हुए तबादलों और नई नियुक्तियों में कथित गड़बड़ियों की एसआईटी जांच की मांग कर दी। इस पर मंत्री नंदी जवाब देने के बजाय उलटे पत्रकार पर ही सवाल उठाने लगे। उन्होंने भ्रष्टाचार से जुड़े सवालों को ब्लैकमेलिंग बताकर विवाद को और गहरा कर दिया।

पत्रकारिता बनाम सत्ता का टकराव
बताते चलें कि ‘यूपी की बात’ चैनल बीते एक साल से औद्योगिक विकास विभाग में हो रही मनमानी पदस्थापनाओं, भाई-भतीजावाद और घूसखोरी जैसे मामलों को उजागर करता रहा है। चैनल की रिपोर्ट्स के अनुसार विभाग में डेढ़ दर्जन से अधिक अधिकारियों के तबादले और नई पोस्टिंग बिना पारदर्शिता के की गई हैं।

आर.सी. भट्ट ने मंत्री से पूछा कि आखिर किन मानकों के आधार पर ये तैनातियाँ हुईं और क्यों पारदर्शिता नहीं बरती गई। इसके जवाब में मंत्री ने कोई स्पष्ट उत्तर देने के बजाय पत्रकार पर निजी हमला बोल दिया।

एसआईटी जांच की मांग और प्रतिक्रिया
आर.सी. भट्ट का कहना है कि उनका काम सत्ता से सवाल करना है और वे जनहित में यही करते रहेंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि विभाग में हुई नियुक्तियों और तबादलों की निष्पक्ष एसआईटी जांच कराई जाए। उनका सवाल है—“अगर सब कुछ सही है, तो जांच से डर क्यों?”

सोशल मीडिया पर विरोध और समर्थन
सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से वायरल हो गया है। लोग मंत्री के बयान की आलोचना कर रहे हैं और पूछ रहे हैं कि एक सवाल पूछने पर पत्रकार को “ब्लैकमेलर” कहना कहां तक उचित है। कई लोगों ने इसे पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमला बताया है।

वहीं कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि अगर मंत्री पर लगे आरोप बेबुनियाद हैं, तो पारदर्शी जांच से परहेज क्यों?

आगे क्या?
अब सबकी नजरें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हैं कि वे इस गंभीर मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं। क्या वे एसआईटी जांच के आदेश देंगे या इस मामले को केवल एक राजनीतिक टकराव मानकर दरकिनार कर देंगे?

इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ औद्योगिक विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि सत्ता और पत्रकारिता के रिश्ते की सीमाओं को भी उजागर किया है।

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