अजब मध्यप्रदेश का गजब सिद्धांत: गुलाम हैं और गुलाम ही बने रहना है
(शैलेन्द्र बिरानी)
एमपी (आरएनआई) हम बात कर रहे हैं भारत के एक राज्य मध्यप्रदेश की — जिसके सिद्धांत पर चलते हुए देश के अन्य राज्य भी खुद को अजब-गजब बनाते जा रहे हैं और इस पर गर्व का ढोल पीट रहे हैं। इस राज्य को बस गुलाम जनता चाहिए — और जनता को भी गुलाम बनकर ही रहना है। बस हर वर्ष करोड़ों का कर्ज मिलता रहे, यही इसका स्थायी मंत्र बन गया है। अंग्रेज़ों की गुलामी यहाँ के खून में स्थायित्व के साथ घुल-मिल गई है। मानसिक गुलामी आज तक खत्म नहीं हुई, बल्कि हर नस में स्थायी रूप से बस चुकी है।
हाल ही में एक खबर सामने आई कि यहाँ प्रतिभाओं का पलायन दिन-दुगुनी, रात-चौगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है, क्योंकि रोजगार के अवसर नहीं मिल रहे। पिछले 15 वर्षों में करीब दो हजार खिलाड़ी मध्यप्रदेश छोड़ चुके हैं, जिनमें 150 राष्ट्रीय खिलाड़ी शामिल हैं। कई और खिलाड़ी जाने की तैयारी में हैं। इनमें छह वर्ल्ड कप गोल्ड जीत चुके खिलाड़ी भी अपना बोरी-बिस्तर बांधकर तैयार बैठे हैं।
इस मामले में प्रतिभाओं को नौकरी और सम्मानजनक जीवन देना मध्यप्रदेश प्रशासन को टेढ़ा और आत्मबोझ लगता है। प्रदेश पर जितना कर्ज है, उससे कई गुना अधिक योगदान देने वाली प्रतिभाओं के साथ भी यही व्यवहार होता है। राज्य शासन या मुख्यमंत्री से सार्वजनिक बधाई पाने वाले, राज्यपाल से सम्मान प्राप्त करने वाले और राजभवन की अतिथि पुस्तिका में अपने नाम दर्ज करवाने वाले व्यक्ति भी जब मध्यप्रदेश को अलविदा कह देते हैं, तब भी राज्यपाल, शासन, जनसंपर्क विभाग और मीडिया को कोई फर्क नहीं पड़ता।
अगर लाखों लोगों को रोजगार मिल जाए, उन्हें स्थायी और खुशहाल जीवन मिल जाए, और प्रदेश का कर्ज उतर जाए — तो शायद इस प्रदेश के कर्ताधर्ता खुली और आजाद हवा में दम घुटने से मर जाएं, क्योंकि गुलामी इनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।
हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश इतिहास के पहले व्यक्ति — शैलेन्द्र कुमार बिराणी की, जिन्होंने बिना किसी एजेंट के व्यक्तिगत रूप से पेटेंट हासिल किया। वह पेटेंट इतना प्रभावशाली था कि बिना विदेश गए ही उन्होंने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ, द ग्लोबल फंड, अंतर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस सोसाइटी (जिनेवा), अमेरिका के राष्ट्रपति, द क्लिंटन फाउंडेशन, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने उन्हें बधाइयाँ भेजीं। दुनिया के सबसे बड़े बिजनेस-टू-बिजनेस पोर्टल ने स्वयं फोन कर संपर्क किया। चालीस से अधिक देशों की कंपनियों ने उन्हें लिखित रूप में अरबों-खरबों के ऑर्डर दिए।
भारत को सिर्फ उत्पाद बनाना था, पेटेंट बेचना नहीं। भारत अपनी जरूरत का केवल 40% उत्पादन कर पा रहा था, जबकि 60% आयात करना पड़ता था। उत्पाद यूज़-एंड-थ्रो श्रेणी का था, इसलिए हर दिन मांग 10% की दर से बढ़ना तय था। दुनियाभर की मशीनरी की जानकारी, निवेशकों के प्रस्ताव, विभिन्न देशों की आर्थिक स्थिति की रिपोर्ट — सब कुछ उन्होंने विस्तृत योजना के साथ भारत सरकार को भेज दिया। उन्होंने भारतीय कानून के अनुसार अपनी कमाई में कोई विशेष हिस्सा नहीं मांगा, बस इतना कहा कि आविष्कार और सामाजिक जीवन चलाने के लिए आवश्यक सहयोग दिया जाए।
राष्ट्रपति ने स्वयं उनसे संपर्क कर भोपाल प्रवास के दौरान मुलाकात का समय दिया था, लेकिन मध्यप्रदेश शासन ने अंतिम क्षण में उनका नाम सूची से हटा दिया, जबकि डिप्टी कलेक्टर फोन कर सारी व्यवस्था पूरी कर चुके थे। यदि राष्ट्रपति से वह मुलाकात हो जाती, तो मध्यप्रदेश में दो विशेष औद्योगिक उत्पाद जोन स्थापित होते और सैकड़ों नई कंपनियाँ खुलतीं। पर यह बात न शासन को रास आई, न कुर्सीधारियों को, न मीडिया को। क्योंकि यहाँ उधारी मांगकर जीना, जी-हजूरी करना और गुलामी की तरह दुम हिलाना ही संस्कृति बन चुका है।
शैलेन्द्र कुमार बिराणी ने एड्स, हेपेटाइटिस, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, इबोला, जीका, और कोरोना जैसी महामारियों से पहले ही आगाह किया था, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। जब कोरोना आया, तो लाखों लोग मारे गए, पर प्रशासन का दिल नहीं पसीजा।
उन्होंने राष्ट्रपति को कोरोना रोकथाम का उपाय भेजा, राष्ट्रपति ने उसे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय को अग्रेषित किया, लेकिन शासन ने उसे दबा दिया, और लोग मरते रहे।
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