तारापीठ का अद्भुत चमत्कार: बामाखेपा और मां तारा का अलौकिक संबंध
पश्चिम बंगाल (आरएनआई) – पश्चिम बंगाल के तारापीठ मंदिर की कथा भारतीय धर्म और भक्ति परंपरा में अद्वितीय स्थान रखती है। यहाँ के प्रमुख संत वामाचरण, जिन्हें बामाखेपा के नाम से जाना जाता है, और मां तारा के बीच अद्भुत मां-बेटे जैसा रिश्ता रहा।
बाल्यकाल में अनाथ हुए वामाचरण को मामा के पास भेजा गया, जहाँ उन्होंने साधु-संगति में समय बिताया और देवी तारा के प्रति गहरी भक्ति विकसित की। युवावस्था में बामाखेपा ने श्मशान में समाधि साधना के दौरान मां तारा के दर्शन किए। इस अद्भुत दर्शन के बाद वे तीन दिन तक समाधि में रहे।
बामाखेपा के अनोखे और अजीबो-गरीब व्यवहार ने पंडितों को खटकाया। प्रसाद चखने की उनकी सरल वृत्ति को लेकर पंडितों ने उन्हें पिटवाया, लेकिन मां तारा ने स्वप्न में रानी को चेतावनी दी और बामाखेपा को पुजारी बनाने का आदेश दिया। इसके बाद बामाखेपा ने अपनी मर्जी से पूजा विधि अपनाई, जिसे कोई नियम नहीं बाँध सकता था।
उनकी भक्ति और अलौकिक शक्तियों के कारण बीमार लोग स्वस्थ हुए, निसंतान दंपतियों को संतान मिली, और सभी श्रद्धालुओं की मनोकामनाएँ पूरी हुईं। बामाखेपा ने अपने जीवन में कभी भी बिना चखे मां तारा को भोजन नहीं कराया; मां स्वयं उनके हाथों से भोजन ग्रहण करती थीं।
बामाखेपा का जीवन और तारा माई के साथ उनका गहरा संबंध आज भी तारापीठ को भक्तों के लिए एक महाप्रसिद्ध तीर्थस्थल बनाता है। उनकी अद्भुत कथाएँ और चमत्कार यहां आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को मंत्रमुग्ध कर देती हैं।
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