ढाई साल बाद कर्नाटक कांग्रेस में फिर कुरसी की जंग, पद छोड़ने के मूड में नहीं सिद्धरमैया

Nov 22, 2025 - 11:57
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ढाई साल बाद कर्नाटक कांग्रेस में फिर कुरसी की जंग, पद छोड़ने के मूड में नहीं सिद्धरमैया

नई दिल्ली (आरएनआई) कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर एक बार फिर तनाव खुलकर सामने आ गया है। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के कार्यकाल के ढाई साल पूरा होने के बाद यह सवाल फिर गर्म हो गया है कि क्या डीके शिवकुमार को सत्ता हस्तांतरण होगा या नहीं। पार्टी के भीतर चल रही रस्साकसी ने एक बार फिर कांग्रेस नेतृत्व के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है।

दो साल पहले कांग्रेस 224 सीटों में से 135 पर जीतकर कर्नाटक में सत्ता में लौटी थी। यह कांग्रेस की उस समय की सबसे बड़ी चुनावी सफलता थी, लेकिन जश्न पूरा भी नहीं हुआ था कि सिद्धरमैया और शिवकुमार के बीच सत्ता साझेदारी पर विवाद शुरू हो गया। तब आलाकमान ने समझौता कराकर मामला शांत करा दिया था, लेकिन विवाद अब एक बार फिर उभर चुका है।

शिवकुमार खेमे की दिल्ली में सक्रियता

सूत्रों के अनुसार शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग को लेकर करीब 15 विधायक और एक दर्जन विधान परिषद सदस्य दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। उनका मानना है कि सत्ता साझेदारी के फार्मूले के अनुसार अब कुर्सी बदलनी चाहिए। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व ने इस पर औपचारिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

सिद्धरमैया का साफ संदेश – मैं सीएम बना रहूंगा
दिल्ली की हलचल के बीच मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने कहा कि वह पद छोड़ने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि नेतृत्व परिवर्तन, कैबिनेट फेरबदल या सरकार में किसी बदलाव पर निर्णय कांग्रेस हाईकमान ही करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि विधायकों की दिल्ली मौजूदगी से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

शिवकुमार – फैसला नेतृत्व का, हम तैयार
कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने बयान दिया कि उन्होंने अपनी तरफ से जिम्मेदारी हाईकमान पर छोड़ दी है। उन्होंने कहा कि जो फैसला पार्टी नेतृत्व करेगा, वही माना जाएगा। सिद्धरमैया के बयान पर उन्होंने कहा—
“मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। हम सब मिलकर काम करेंगे।”

अंदरूनी तनाव पर बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया
पार्टी के प्रदेश प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने दावा किया कि बीजेपी और मीडिया का एक हिस्सा कांग्रेस सरकार को अस्थिर दिखाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संघर्ष नया नहीं है और राजस्थान में गहलोत-पायलट विवाद की तरह पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

कांग्रेस के सामने एक बार फिर कठिन परीक्षा
सिद्धरमैया और शिवकुमार दोनों ही बड़े जनाधार वाले नेता हैं। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव है कि वह स्थिति को बगैर किसी बड़े नुकसान के संभाले। क्योंकि इससे पहले इसी तरह के अंदरूनी विवादों ने कांग्रेस की कई राज्यों में सरकारें कमजोर की हैं।

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