मोदी–अडानी संबंध, भ्रष्टाचार के आरोप और शेख हसीना की मौत की सजा: एक विवादित ऊर्जा सौदे की पूरी कहानी
नई दिल्ली (आरएनआई) बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को अंतरराष्ट्रीय अपराध ट्राइब्यूनल ने भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई है। यह फैसला न केवल बांग्लादेश की राजनीति में हलचल पैदा कर रहा है, बल्कि भारत और विशेषकर अडानी समूह से जुड़े उस विवादित ऊर्जा सौदे की ओर भी ध्यान खींच रहा है, जिसकी शुरुआत साल 2014 के बाद हुई थी।
भारत लंबे समय से बांग्लादेश को बिजली का निर्यात करता रहा है, और यह काम मुख्य रूप से सरकारी कंपनियों द्वारा किया जाता था। लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद परिस्थितियाँ बदलीं। जून 2015 में ढाका यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने शेख हसीना से भारत की निजी ऊर्जा कंपनियों—खासकर नवोदित कॉरपोरेट समूहों—को भी अवसर देने का अनुरोध किया। इसी बातचीत के दो महीने बाद, 11 अगस्त 2015 को अडानी समूह और बांग्लादेश सरकार ने पावर सेक्टर में एक अहम एमओयू पर हस्ताक्षर किए, जिसकी प्रक्रिया को लेकर बांग्लादेश के कई अधिकारियों ने उस समय आपत्ति भी जताई थी।
अडानी के पास उस समय ऐसा कोई पावर प्लांट नहीं था, जिससे वह बांग्लादेश को बिजली दे सके। इस कारण झारखंड के गोड्डा में 1,600 मेगावाट के थर्मल पावर प्रोजेक्ट की नींव रखी गई। इस परियोजना की शुरुआत के लिए भारत सरकार के ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (REC) से 700 मिलियन डॉलर का लोन भी दिलवाया गया—जबकि REC का उद्देश्य भारत के ग्रामीण इलाकों में बिजली पहुँचाना है, न कि निर्यात-उन्मुख व्यापारिक प्रोजेक्ट को वित्त देना।
इसके बाद नवंबर 2017 में अडानी पावर लिमिटेड ने बांग्लादेश पावर डिविजन के साथ 1,496 मेगावाट बिजली की आपूर्ति के लिए समझौता किया। यह करार 25 साल के लिए तय किया गया, जिसे ऊर्जा विशेषज्ञ असामान्य मानते हैं, क्योंकि पावर परचेज एग्रीमेंट सामान्यतः छोटी अवधि के लिए तय किए जाते हैं ताकि बाजार की कीमतों में उतार–चढ़ाव का असर उपभोक्ता देशों पर न पड़े।
इस समझौते में बांग्लादेश को हर साल “क्षमता शुल्क” (Capacity Charge) देना था—चाहे बिजली की खपत हो या न हो। यह शुल्क 3.26 टका प्रति यूनिट तय किया गया, जो देश के किसी भी बिजली संयंत्र की तुलना में सबसे अधिक था। इसी के आधार पर बांग्लादेश को अडानी को 25 वर्षों में कुल 108,000 करोड़ टका से अधिक का भुगतान करना था, जबकि इससे काफी सस्ती बिजली भारत की सरकारी कंपनियाँ पहले से उपलब्ध करा रही थीं। उदाहरण के लिए, एनटीपीसी बांग्लादेश को प्रति यूनिट 3.42 रुपये की दर से बिजली दे रहा था, जबकि निजी कंपनियों की दर औसतन 5.82 रुपये थी—और अडानी की दर इससे भी ऊपर पहुँची हुई थी।
इसी दौरान भारत ने 2017 में बांग्लादेश को 10 अरब डॉलर का निवेश और 5 अरब डॉलर का ऋण देने की घोषणा की, जो किसी भी देश को भारत द्वारा प्रदान किया गया सबसे बड़ा पैकेज था। इसके बाद 2018 में—राष्ट्रीय चुनावों से कुछ महीने पहले—अडानी के गोड्डा पावर स्टेशन को विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) का दर्जा दे दिया गया। यह भारत का पहला ऐसा पावर SEZ था, जिसका उद्देश्य पूरी तरह निर्यात था। इस दर्जे से अडानी को आयातित कोयले, रेल मार्ग उपयोग और अन्य शुल्कों में बड़ी राहत मिली।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि झारखंड में प्रचुर मात्रा में कोयला उपलब्ध होने के बावजूद अडानी ने बिजली उत्पादन के लिए 8,000 किलोमीटर दूर ऑस्ट्रेलिया स्थित अपनी कारमाइकल खदान से कोयला आयात करने का निर्णय लिया। इससे बांग्लादेश पर कोयला आयात का खर्च कई गुना बढ़ गया। एक बार अडानी द्वारा 400 डॉलर प्रति टन कोयले का बिल भेजा गया था, जबकि बांग्लादेशी अधिकारी इसी कोयले के लिए 245 डॉलर प्रति टन भुगतान कर रहे थे।
वित्तीय वर्ष 2022–23 में बांग्लादेश ने अडानी से प्रति यूनिट 14.02 टका की दर से बिजली खरीदी, जो देश में उपलब्ध अन्य स्रोतों की तुलना में बेहद महंगी थी। भुगतान में लगातार देरी होने लगी और अंततः 2023 में बांग्लादेश पावर डेवलपमेंट बोर्ड (BPDB) ने अडानी को पत्र लिखकर दरों में संशोधन करने की मांग की।
इसके बाद जुलाई 2024 में जब शेख हसीना की सरकार भारी विवादों में घिरी, तो वे भारत में शरण लेने पहुँचीं। उनके सत्ता से हटते ही अडानी के साथ हुए इस बिजली सौदे की व्यापक समीक्षा की मांग उठने लगी। नई सरकार ने संकेत दिया कि बहुत जल्द इस प्रोजेक्ट की जांच रिपोर्ट सामने आएगी।
यह पूरा प्रकरण न केवल बांग्लादेश के लिए आर्थिक बोझ का कारण बना, बल्कि भारत में क्रोनी कैपिटलिज़्म—राजनीति और पूँजी के गठजोड़—की बहस को भी नए सिरे से छेड़ गया है। बांग्लादेश की जनता महंगी बिजली और भारी आर्थिक दबाव झेलती रही, जबकि सौदे का सबसे बड़ा लाभ अडानी समूह को मिलता रहा। इस पूरी कहानी को दक्षिण एशियाई राजनीति और व्यापारिक हितों के एक जटिल और विवादित अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।
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