निर्धारित रेट से अधिक मूल्य पर बिक रही यूरिया, कुम्भकरणी नींद में कृषि विभाग
हरदोई (आरएनआई) जिले में रबी सीजन के बीच किसानों की परेशानियां लगातार बढ़ रही हैं। कृषि व्यवस्था से जुड़े अनियमित नियम-कानून और बाजार की मनमानी ने किसानों की कमर तोड़कर रख दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में पेस्टीसाइड की दुकानें बिना योग्यता के खुली हैं, खाद की ऊँचे दाम पर बिक्री हो रही है और मंडियों में धान की बिक्री के समय आढ़तियों द्वारा कटौती की जा रही है। साथ ही, सरकारी सिस्टम के जटिल नियमों ने किसानों को पूरी तरह फंसा दिया है।
बिना योग्यता के पेस्टीसाइड दुकानें, विभाग की अनदेखी
नियमों के अनुसार पेस्टीसाइड दुकान खोलने के लिए कृषि स्नातक होना अनिवार्य है। लेकिन ग्रामीण चौराहों, बाजारों और गली-कूंचों में कक्षा 8 पास और हाईस्कूल फेल तक के लोग भी पेस्टीसाइड की दुकानें चला रहे हैं। तकनीकी जानकारी के अभाव में गलत दवाइयों की बिक्री से फसलें नुकसान झेल रही हैं, जबकि विभागीय कार्रवाई लगभग न के बराबर है।
खाद की महंगाई—सरकारी रेट 266.50 बिक्री 380–400 रुपये में
सरकार द्वारा यूरिया का मूल्य 266.50 रुपये प्रति बैग तय है, लेकिन निजी दुकानों में इसे 380–400 रुपये तक बेचा जा रहा है। सरकारी गोदामों पर अक्सर “स्टॉक खत्म” बताया जाता है, जिससे किसान मजबूरन महंगी खाद खरीदने को विवश हैं।
फार्मर रजिस्ट्री, खतौनी और आधार—खाद लेने में बाधा
सरकारी दुकानों पर खाद लेने के समय किसानों को फार्मर रजिस्ट्री, खतौनी, आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज़ अनिवार्य कर दिए गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल सुविधा की कमी के कारण किसान घंटों लाइन में लगते हैं और कई बार दस्तावेज़ अधूरे होने के कारण खाद नहीं मिल पाती। किसानों का कहना है—“खाद पहले ही महंगी है, अब कागजी नियम-कानून ने हालात और कठिन कर दिए हैं।”
मंडी में औने-पौने दाम पर धान बेचने को मजबूर
मंडियो मे किसान अपनी उपज धान औने पौने दाम पर बेचने को मजबूर हैं ऊपर से आढ़तियों द्वारा तौल कटौती, गुणवत्ता कटौती, पल्लदारी और कमीशन के नाम पर पैसा काट लिया जाता है। किसानों का कहना है कि वे औने-पौने दाम पर धान बेचने को मजबूर हैं।
सरकारी नियमों और बाजार की मनमानी में फंसा किसान
किसानों ने बताया— “मंडी में दाम नहीं मिलता, खाद लेने में कागजी बाधाएँ हैं, दवा और बीज पर मनमानी है। कुल मिलाकर हम सरकारी नियमों के मकड़जाल में फंसकर सरकारी कर्मचारियों के सवालों से विलविलाकर रह गए हैं।” किसानों का आरोप है कि अधिकारी जमीन पर नहीं आते और सिर्फ कागजों में सक्रिय दिखते हैं।
किसान बोले—“हमारी सुनवाई कहीं नहीं”
डीजल, बीज, खाद, पेस्टीसाइड और मंडी कटौती की मार से किसान पहले ही आर्थिक संकट में है। किसानों का दर्द साफ है— “मेहनत हम करते हैं, फसल हम उगाते हैं, पर हर कदम पर नियम और अधिकारियों के सवाल हमें ही परेशान करते हैं। हमारी सुनवाई कहीं नहीं हो रही। हमारी जिंदगी आज भी भगवान भरोसे चल रही है।”
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