निर्वासित गर्भवती महिला पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से मानवीय आधार पर पुनः प्रवेश पर विचार करने को कहा
नई दिल्ली (आरएनआई)। सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेश निर्वासित गर्भवती महिला सोनाली खातून के मामले में केंद्र सरकार को कड़ी नसीहत देते हुए कहा है कि वह महिला और उसके अजन्मे बच्चे को मानवीय आधार पर भारत में वापस लेने पर विचार करे। अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि यदि आवश्यक हो तो उसे अस्पताल में निगरानी में रखा जाए, ताकि किसी तरह की जटिलता न पैदा हो।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि केंद्र सरकार इस बात पर स्पष्ट निर्देश दे कि क्या महिला को पश्चिम बंगाल के मालदा सीमा से भारत में प्रवेश की अनुमति दी जा सकती है। मेहता ने दो दिन का समय मांगा और कहा कि सरकार मामले को मानवीय दृष्टिकोण से देखने को तैयार है।
महिला के पिता भोदू शेख की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने अदालत को बताया कि सोनाली खातून बांग्लादेश की ओर से प्रवेश की प्रतीक्षा कर रही हैं। हेगड़े ने यह भी कहा कि यदि सोनाली को भारत लौटने की अनुमति मिलती है, तो उसके पति को भी आने की अनुमति दी जानी चाहिए। पीठ ने इस पर सहमति जताई कि परिवार को अलग नहीं किया जाना चाहिए।
इस मामले से जुड़े तथ्यों में दावा किया गया है कि सोनाली खातून, उनके पति दानेश शेख और उनके पांच वर्षीय बेटे को दिल्ली पुलिस ने जून में बांग्लादेशी होने के संदेह में हिरासत में लिया और बाद में उन्हें अवैध रूप से बांग्लादेश निर्वासित कर दिया गया। कहा जा रहा है कि रोहिणी सेक्टर-26 में दो दशक से मेहनत मजदूरी कर रहे दर्जनों परिवारों को इसी तरह उठाकर सीमा पार भेज दिया गया था, जहां बांग्लादेश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
उधर, सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांगजनों को कार खरीदने पर जीएसटी रियायत दिए जाने संबंधी मामले में भी केंद्र और जीएसटी परिषद को नोटिस जारी किया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने चार सप्ताह में जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि दिव्यांगों को मिलने वाली रियायती जीएसटी सुविधा को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया गया है, जबकि दिव्यांग अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 41 के तहत उन्हें परिवहन सुविधाओं में सहूलियत मिलनी चाहिए।
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