चरनोई ज़मीन पर खेती, सड़कों पर बेसहारा गौवंश — समाधान किसके पास?
गुना (आरएनआई) चरनोई की भूमि यानी चारागाह। 1999 से 2002 के बीच मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने निर्धन भूमिहीन दलित आदिवासी परिवारों के लिए उनके ही गाँव की सरकारी चरनोई जमीन में से खेती के लिए जमीन के पट्टे बाँटे थे। प्रदेश के 3 लाख 44 हजार 329 अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों को 6 लाख 98 हजार 576 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। यानी चरनोई की जमीन भी किसानों के पास ही है।
निराश्रित गौवंश की जब भी बात आती है तो अनेक विद्वान तत्काल तालु में जुबान फटकार कर समाधान बताते हैं कि "चरनोई की जमीन मुक्त करा दो।" कौन किसान ऐसा है जो जमीन छोड़ेगा। और चरनोई की जमीन क्या कोई आधुनिक गौ शाला थीं क्या, जहां चारा, खली, पानी, इलाज बारिश से बचने शेड अपने आप उग आता हो। चरनोई की जमीन तब भी वो जमीन थी जहां कुछ नहीं होता था। ऐसी जमीन तब भी मेड़िया किसानों ने हांक रखीं थीं।
रिकॉर्ड के अनुसार मप्र में 94 लाख 68 हजार 900 हेक्टेयर वन क्षेत्र है। लेकिन मैदानी हकीकत इससे जुदा है। हर साल किसान जंगल काटकर खेत बना रहे हैं।।इसी तरह प्रदेश में कुल 307.56 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है। कृषि भूमि प्रदेश की कुल भूमि का 50 फीसदी है।
मध्यप्रदेश में लगभग 01 करोड़ किसान हैं।
पशु गणना के अनुसार प्रदेश में 09 लाख निराश्रित गौ वंश है, जो सड़कों पर मारा मारा फिरता है, कारण यह है कि किसान अब ट्रेक्टर और मशीनों से खेती करता है। अब उसे बैल नहीं चाहिए। बैल की जरूरत नहीं इसलिए सड़कों पर सांड बढ़ गए और गायें मारी मारी फिरने के लिए छोड़ दी गईं क्योंकि ये अब किसान के लिए बोझ है।
प्रदेश में 2000 गौ शाला हैं, वह भी देसी गौपालन की स्थिति में नहीं हैं। जो लोग गौशाला संचालन की दौंड़ पीटते दिखें एक बार उनकी गौ शाला में जाकर झांकना वहां उन्नत नस्ल की दुधारू गाय ही मिलेंगी जिनका दूध घी खाकर संचालक के गाल लाल हो रहे होंगे। आप उससे पूछना कि सड़क पर फिर रहीं कुछ देसी बीमार गाय भी रखकर सेवा कर लो तब आपको उसके इरादे और असलियत समझ आएगी। हर क्षेत्र में कुछ अपवाद होते हैं तो यहां भी कुछ ईमानदार मिल सकते हैं। जिनका नागरिक अभिनंदन होना चाहिए।
खैर गौशाला को प्रति मवेशी सिर्फ 20 रुपए खर्च शासन की ओर से मिलता था। जो कुछ दिन पहले मोहन सरकार ने बढ़ाकर 40 रुपए किया है। लेकिन प्रति मवेशी खुराक का खर्च करीब 100 रुपए आता है। इसमें बीमार मवेशी के इलाज, मवेशियों की देखरेख करने वाले कर्मचारी आदि की व्यवस्था का व्यय अलग है जो सरकार नहीं देती। देसी गाय गौशाला में रखना तिगुनी घाटे का सौदा है।
खैर,, मप्र में कुल ग्राम 54,903 हैं, जो 22,812 ग्राम पंचायतों के अंतर्गत आते हैं। अब यदि सड़कों पर मारे मारे फिर रहे 09 लाख गौ वंश को इन ग्रामों में बांटा जाए तो 16 गाय एक पूरा गांव मिलकर रख सकता है। 40 गाय एक ग्राम पंचायत मिलकर रख सकती है। प्रदेश में 01 करोड़ किसान हैं, यदि 11 किसान मिलकर एक गाय की व्यवस्था भी करें तो समस्या का समाधान हो सकता है।
इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है।
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