10 साल में प्रदूषण से 38 लाख मौतें, अब छोटे शहरों की हवा भी जहरीली — रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
नई दिल्ली (आरएनआई): भारत में प्रदूषण का खतरा अब सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं रहा। स्वीडन के कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट की ताज़ा रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि 2009 से 2019 के बीच वायु प्रदूषण के कारण देश में लगभग 38 लाख लोगों की मौत हुई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत की पूरी आबादी ऐसे इलाकों में रह रही है, जहां पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानकों से कहीं अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार, अब छोटे और औद्योगिक शहर देश के नए “प्रदूषण हॉटस्पॉट” बन रहे हैं। यह आंकड़ा और भी भयावह हो जाता है जब WHO के सख्त मानक (5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) को आधार बनाया जाए — इस स्थिति में यह संख्या लगभग 1.66 करोड़ मौतों तक पहुंच सकती है।
हर दस माइक्रोग्राम की वृद्धि पर मौतों में 8.6% इजाफा
अध्ययन में पाया गया कि पीएम 2.5 कण अत्यंत सूक्ष्म होते हैं — बाल की मोटाई से 30 गुना पतले, जो सांस के जरिए फेफड़ों और रक्त प्रवाह तक पहुंच जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि पर मृत्यु दर में 8.6% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
छोटे शहर बने प्रदूषण के नए केंद्र
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, असम-मेघालय सीमा पर स्थित छोटा औद्योगिक नगर बर्नीहाट अब देश का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। यहां का सालाना पीएम 2.5 स्तर 133.4 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया — जो WHO मानक से 26 गुना ज्यादा है।
“सांसों का आपातकाल” — सीएसई की चेतावनी
दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) की रिपोर्ट “सांसों का आपातकाल” में कहा गया है कि प्रदूषण अब केवल दिल्ली, मुंबई या पटना जैसे महानगरों की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरे भारत की हवा को विषाक्त कर चुका है।
प्रदूषण अब सालभर का संकट
दिल्ली के क्लाइमेट-टेक स्टार्टअप रेस्पिरर लिविंग साइंसेज की 2021 से 2024 के बीच की स्टडी में पाया गया कि देश के 11 बड़े शहरों में पीएम 10 स्तर लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा मानक 60 माइक्रोग्राम से कहीं ऊपर बना रहा।
दिल्ली के आनंद विहार में यह स्तर 313.8 माइक्रोग्राम,
जबकि पटना में 237.7 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया।
रेस्पिरर के सीईओ रोनक सुतारिया ने कहा, “अब यह समस्या केवल सर्दियों की नहीं रही। भारत में हम पूरे साल जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं। प्रदूषण घटाने के प्रयासों में कोई स्थायी सुधार नहीं दिखता।”
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में प्रदूषण से लड़ाई सिर्फ वाहनों या उद्योगों तक सीमित नहीं रह सकती। इसके लिए शहरों में स्वच्छ ऊर्जा नीति, कचरा प्रबंधन, हरित आवरण और औद्योगिक निगरानी को मजबूत करना जरूरी है।
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