मीडिया को संवैधानिक दर्जा देने की मांग फिर चर्चा में, वैज्ञानिक ने सुप्रीम कोर्ट व मुख्य न्यायाधीशों को भेजे दस्तावेज
शैलेंद्र बिरानी
नई दिल्ली (आरएनआई) मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का कानूनी दर्जा देने की मांग एक बार फिर सुर्खियों में है। युवा वैज्ञानिक शैलेन्द्र कुमार बिराणी ने दावा किया है कि उनके पास इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण अवलोकन और उससे जुड़े आधिकारिक दस्तावेज मौजूद हैं, जिन्हें उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश और सभी राज्यों की उच्च न्यायपालिकाओं के प्रमुखों तक पहुंचाया है।
शैलेन्द्र ने बताया कि 21 सितंबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट में न्यूज चैनलों की लाइव डिबेट में हेट स्पीच के मामलों की सुनवाई के दौरान जस्टिस के. एम. जोसेफ और हृषिकेश राय की पीठ ने टिप्पणी की थी कि इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और सोशल मीडिया पर नियंत्रण के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं है और सरकार को इस पर नियामक तंत्र बनाने का जवाब देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह तथ्यात्मक टिप्पणी पहले से ही प्रमाणित रूप में उनके पास थी, जो उन्होंने 19 अगस्त 2011 को राष्ट्रपति को भेजे एक पत्र (Letter Ref. No. P1/D/1908110208) में दर्ज की थी। उस पत्र पर राष्ट्रपति सचिवालय की आधिकारिक मोहर और हस्ताक्षर भी हैं।
शैलेन्द्र का कहना है कि अगर मीडिया को संवैधानिक अधिकार और कानूनी दर्जा मिल जाए, तो पत्रकारिता से जुड़े कई मुद्दे—जैसे हेट स्पीच, पेड न्यूज, पत्रकारों पर हमले, राजनीतिक दबाव और अश्लील प्रसारण—पर अंकुश लगाया जा सकता है और हजारों लंबित मामलों में तेजी से न्याय हो सकता है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की बात तो सभी करते हैं, लेकिन पत्रकारों के अंदर संगठनात्मक एकजुटता की कमी और ‘अपना-अपना क्रेडिट’ लेने की प्रवृत्ति के कारण यह मांग ठोस रूप नहीं ले पा रही है।
शैलेन्द्र ने साफ किया कि उन्हें न तो किसी आर्थिक मदद की आवश्यकता है और न ही वह कोई याचिका दायर करना चाहते हैं, बल्कि केवल न्यायपालिका का ध्यान इस संवैधानिक कमी की ओर आकर्षित करना चाहते हैं।
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