बिहार में मतदाता सूची को लेकर बवाल, कार्यकर्ता पहुंचे सुप्रीम कोर्ट; EC के फैसले को बताया संविधान विरोधी

बिहार में चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट के विशेष पुनरीक्षण को लेकर विवाद बढ़ गया है। दो सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रक्रिया गरीबों, महिलाओं और प्रवासियों को मतदाता सूची से बाहर करने की कोशिश है। विपक्षी दलों और कई संगठनों ने भी चुनाव आयोग के आदेश को असंवैधानिक बताते हुए कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं।

Jul 9, 2025 - 15:00
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बिहार में मतदाता सूची को लेकर बवाल, कार्यकर्ता पहुंचे सुप्रीम कोर्ट; EC के फैसले को बताया संविधान विरोधी

नई दिल्ली (आरएनआई) बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट की 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' यानी एसआईआर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। दो सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनका कहना है कि चुनाव आयोग की ये प्रक्रिया संविधान की मूल भावना के खिलाफ है और इससे गरीब, प्रवासी और हाशिए पर मौजूद समुदायों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा सकता है।

 सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सुधांशु धूलिया और जॉयमल्या बागची की बेंच ने बुधवार को इस मामले पर सुनवाई के लिए हामी भर दी है। यह सुनवाई 10 जुलाई को होगी। सामाजिक कार्यकर्ता अर्शद अजमल और रूपेश कुमार की ओर से वकील वृंदा ग्रोवर ने कोर्ट में याचिका का ज़िक्र किया और इसे पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि चुनाव आयोग ने 24 जून को जो आदेश जारी किया है, वह गरीबों, प्रवासियों, महिलाओं और वंचित समुदायों को असंतुलित तरीके से प्रभावित कर सकता है। उनका कहना है कि इस रिवीजन में जन्म, निवास और नागरिकता जैसे दस्तावेजों की अनुचित और कठोर मांग की जा रही है, जो कई लोगों के पास नहीं होते।

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि यह प्रक्रिया प्रतिनिधित्व की लोकतांत्रिक व्यवस्था और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की गारंटी देने वाले संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करती है। उनका तर्क है कि बिना स्पष्ट कानूनी आधार के इस तरह की प्रक्रिया लाखों मतदाताओं को वोटिंग के अधिकार से वंचित कर सकती है।


इस मामले में सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि कई विपक्षी दलों के नेता भी सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुके हैं। कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार), शिवसेना (उद्धव गुट), समाजवादी पार्टी, जेएमएम, सीपीआई और सीपीआई (एमएल) के नेताओं ने मिलकर एक याचिका दायर की है। इन नेताओं ने भी चुनाव आयोग के आदेश को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की है।

इसके अलावा पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल), एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और कार्यकर्ता योगेंद्र यादव जैसी शख्सियतों और संगठनों ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। सभी का कहना है कि यह प्रक्रिया मतदाताओं को हटाने की कोशिश है और इसका गलत असर पड़ेगा।

अब सुप्रीम कोर्ट 10 जुलाई को इस मामले की सुनवाई करेगा। यह देखना अहम होगा कि कोर्ट इस पूरे विवाद को संविधान और लोकतंत्र की कसौटी पर कैसे परखता है। बिहार चुनाव से पहले इस फैसले का असर राज्य की चुनावी प्रक्रिया पर भी पड़ सकता है।

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