फर्जी अधिकारी बनकर रिश्वतखोरी का रैकेट चलाने वाले दो ठग गिरफ्तार, करोड़ों की संपत्ति जब्त

Nov 12, 2025 - 10:24
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फर्जी अधिकारी बनकर रिश्वतखोरी का रैकेट चलाने वाले दो ठग गिरफ्तार, करोड़ों की संपत्ति जब्त

नई दिल्ली (आरएनआई)। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने दो फर्जी अधिकारियों को गिरफ्तार किया है, जो खुद को केंद्रीय एजेंसियों का अधिकारी बताकर रिश्वतखोरी और ठगी का संगठित नेटवर्क चला रहे थे। पकड़े गए आरोपियों की पहचान अजीत कुमार पात्रा और मिंकु लाल जैन के रूप में हुई है।

दोनों आरोपियों पर आरोप है कि वे सरकारी आवासों में रहते थे, प्रतिबंधित क्षेत्रों में बेरोकटोक आते-जाते थे, और विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों व धार्मिक आयोजनों में वीआईपी मेहमान बनकर शामिल होते थे। जांच एजेंसियों के अधिकारियों ने बताया कि दोनों सरकारी अफसरों से अपनी पहचान का झांसा देकर लोगों को डराते-धमकाते थे और रिश्वत के नाम पर मोटी रकम वसूलते थे।

18 लाख की रिश्वत लेते पकड़े गए
मामला तब सामने आया जब डायरेक्टरेट जनरल ऑफ जीएसटी इंटेलिजेंस (DGGI) ने 4 नवंबर को एक निजी कंपनी के सीईओ विनोद परिहार के ठिकानों पर छापेमारी की। गिरफ्तारी से बचने के लिए परिहार ने कथित तौर पर इन दोनों ठगों से संपर्क किया। आरोप है कि दोनों ने मामला “सुलझाने” के नाम पर उससे 18 लाख रुपये की रिश्वत मांगी।

सीबीआई को इसकी भनक लगते ही जाल बिछाया गया और दोनों को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया। जांच के दौरान उनके पास से 18 लाख रुपये नकद बरामद किए गए।

अकूत दौलत देखकर अधिकारी भी हैरान
सीबीआई की छापेमारी में दोनों के पास से 3.7 करोड़ रुपये की नकदी, करीब एक किलो सोने के आभूषण, 26 संपत्तियों के दस्तावेज, चार लग्जरी गाड़ियां और 12 अन्य वाहन बरामद हुए हैं। इसके अलावा कई डिजिटल उपकरण और दस्तावेज भी दिल्ली, राजस्थान और ओडिशा के ठिकानों से जब्त किए गए।

जांच अधिकारियों का कहना है कि बरामद संपत्तियों और रकम से यह साफ है कि दोनों ने लंबे समय से बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा और रिश्वतखोरी का नेटवर्क खड़ा कर रखा था।

कई वरिष्ठ अधिकारियों के नाम आए सामने
पूछताछ में दोनों ने कथित तौर पर कई वरिष्ठ अधिकारियों के नामों का उल्लेख किया, जो उनके संपर्क में हो सकते हैं। सीबीआई अब इन सभी नामों की जांच कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या किसी सरकारी तंत्र के भीतर से उन्हें समर्थन मिल रहा था।

सीबीआई सूत्रों के अनुसार, शुरुआती जांच में संकेत मिले हैं कि दोनों लोगों को सरकारी जांच से बचाने या फाइलें रुकवाने के नाम पर करोड़ों रुपये वसूलते थे।

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