‘धर्मनिरपेक्षता केवल दस्तावेजों में नहीं, व्यवहार में दिखे’ — महाराष्ट्र सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
नई दिल्ली (आरएनआई)। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की उस समीक्षा याचिका पर सुनवाई के दौरान सशक्त टिप्पणी की, जिसमें राज्य ने अकोला दंगों की जांच के लिए गठित एसआईटी में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के अफसरों को शामिल करने के आदेश को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति संजय कुमार ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता का पालन केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे व्यवहारिक रूप में लागू किया जाना चाहिए।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के उस खंडित फैसले के दौरान आई, जिसमें न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की समीक्षा याचिका पर अलग-अलग मत दिए। जस्टिस कुमार ने कहा कि 11 सितंबर के आदेश पर पुनर्विचार का कोई ठोस आधार नहीं है, जबकि जस्टिस शर्मा ने कहा कि राज्य की चिंता सीमित है—एसआईटी में धार्मिक आधार पर अफसरों को शामिल करने के निर्देश तक। उन्होंने इस पर खुली अदालत में सुनवाई की अनुमति दी और याचिका पर नोटिस जारी किया।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 11 सितंबर को 2023 के अकोला दंगों की जांच में महाराष्ट्र पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए एसआईटी गठित करने का आदेश दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि जांच दल में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के वरिष्ठ अधिकारियों को शामिल किया जाए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।
राज्य सरकार ने इस आदेश की समीक्षा मांगते हुए तर्क दिया था कि धार्मिक आधार पर अफसरों की नियुक्ति का निर्देश, भले ही नेकनीयती से दिया गया हो, लेकिन यह संस्थागत धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ है। सरकार का कहना था कि इस तरह का आदेश यह संकेत देता है कि लोकसेवक अपने धर्म के प्रति पक्षपाती हो सकते हैं, जो संविधान के मूल ढांचे में निहित धर्मनिरपेक्षता की भावना के विपरीत है।
जस्टिस संजय कुमार ने आदेश का हवाला देते हुए कहा कि अकोला दंगों के दौरान पुलिस ने संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने के बावजूद आवश्यक कार्रवाई नहीं की। न तो प्राथमिकी दर्ज की गई, न ही आरोपी के खिलाफ कोई ठोस कदम उठाया गया, जो पुलिस की ओर से कर्तव्य की गंभीर उपेक्षा को दर्शाता है।
मई 2023 में अकोला में पैगंबर मोहम्मद पर सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक पोस्ट डालने के बाद हिंसा भड़क गई थी। इसमें विलास महादेवराव गायकवाड़ की मौत हो गई, जबकि एक अन्य युवक मोहम्मद अफजल घायल हुआ था। अफजल ने आरोप लगाया था कि उसने चार लोगों को हथियारों से गायकवाड़ पर हमला करते देखा और जब उसने बीच-बचाव की कोशिश की तो हमलावरों ने उस पर भी हमला कर उसका वाहन जला दिया।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल अकोला हिंसा के मामले में जांच की पारदर्शिता को रेखांकित करता है, बल्कि देश के संस्थागत ढांचे में धर्मनिरपेक्षता के वास्तविक अनुपालन की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।
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