ट्रिब्यूनल सुधार कानून पर सुनवाई टालने की मांग से सुप्रीम कोर्ट नाराज, सीजेआई बोले – अब या तो बहस पूरी करें या फैसला आ जाएगा
नई दिल्ली (आरएनआई)। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार पर कड़ा रुख दिखाते हुए ट्रिब्यूनल सुधार कानून 2021 के मामले में दोबारा सुनवाई टालने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि सरकार बार-बार देरी कर अदालत के साथ “अनुचित व्यवहार” कर रही है। मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कहा कि अब या तो केंद्र अपनी बहस पूरी करे या अदालत फैसला सुनाएगी।
मुख्य न्यायाधीश गवई ने तीखे लहजे में कहा, “अगर आप 24 नवंबर के बाद सुनवाई चाहते हैं तो साफ-साफ बताइए। मैं 23 नवंबर को रिटायर हो रहा हूं, फिर हम फैसला कब लिखेंगे?” उन्होंने यह टिप्पणी तब की जब केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी इस समय अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में व्यस्त हैं और शुक्रवार की सुनवाई आगे बढ़ा दी जाए।
सीजेआई ने कहा कि अदालत पहले ही दो बार समय दे चुकी है और अब और देरी स्वीकार नहीं की जाएगी। उन्होंने सवाल किया, “अगर अटॉर्नी जनरल उपलब्ध नहीं हैं तो इतने सारे एएसजी में से कोई क्यों नहीं पेश हो सकता?” अदालत ने यह भी बताया कि शुक्रवार का दिन विशेष रूप से इस सुनवाई के लिए खाली रखा गया है ताकि वीकेंड में निर्णय तैयार किया जा सके।
अंततः अदालत ने तय किया कि शुक्रवार को वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद दातार, जो मद्रास बार एसोसिएशन की ओर से बहस कर रहे हैं, अपनी दलीलें पूरी करेंगे और सोमवार को अटॉर्नी जनरल को केंद्र का पक्ष रखने का अंतिम अवसर दिया जाएगा। सीजेआई ने दो टूक कहा, “अगर वे नहीं आते, तो हम सुनवाई समाप्त कर देंगे।”
पृष्ठभूमि:
ट्रिब्यूनल सुधार (विवेकशीलता और सेवा की शर्तें) अधिनियम, 2021 के तहत केंद्र सरकार ने कई ट्रिब्यूनलों को समाप्त कर दिया था, जिनमें फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलीय ट्रिब्यूनल भी शामिल है। इसके अलावा, ट्रिब्यूनल सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल और पात्रता से संबंधित प्रावधानों में संशोधन किए गए। मद्रास बार एसोसिएशन सहित कई संगठनों ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, यह कहते हुए कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है।
पहले भी ठहराया गया था असंवैधानिक:
गौरतलब है कि 2021 में जब केंद्र ने ट्रिब्यूनल सुधार अध्यादेश लाया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने इसके कई प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराया था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल कम से कम पांच वर्ष होना चाहिए और न्यूनतम आयु सीमा 50 वर्ष तय करना गलत है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि सरकार केवल दो नामों में से एक को चुनने का अधिकार नहीं रख सकती। इसके बावजूद केंद्र ने उन्हीं प्रावधानों को 2021 के अधिनियम में दोबारा शामिल किया, जिस पर अब अदालत ने तीखी आपत्ति जताई है।
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिए हैं कि वह इस मामले में जल्द फैसला सुनाना चाहता है ताकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े इस अहम मुद्दे पर लंबित विवाद का समाधान हो सके।
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