'क्रूरता ही मृत्युदंड का आधार नहीं' — अदालत ने फांसी की सजा बदलकर दी उम्रकैद
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश में कहा है कि अपराध की क्रूर प्रकृति ही मृत्युदंड के लिए पर्याप्त नहीं है। उत्तराखंड के इस मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने देहरादून की बच्ची के साथ दुष्कर्म व हत्या के दोषी की मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।
नई दिल्ली (आरएनआई) सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को इस बात पर जोर देते हुए कहा कि अपराध की क्रूरता या वीभत्स प्रकृति मृत्युदंड देने के लिए पर्याप्त नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि दोषी के सुधार की संभावना वअपराध को कम करने वाली और गंभीर परिस्थितियों की जांच की जानी जरूरी है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 2018 में देहरादून में 10 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या के मामले में अपीलकर्ता जय प्रकाश की दोष सिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन उसकी मृत्युदंड को बिना किसी छूट के आजीवन कारावास में बदल दिया। पीठ ने कहा, अपराध को कम करने वाली परिस्थितियों और दुर्लभतम में से दुर्लभतम श्रेणी की सीमा को ध्यान में रखते हुए हम अपीलकर्ता को मृत्युदंड की बजाय उसके प्राकृतिक जीवनकाल तक बिना किसी छूट के आजीवन कारावास देना उचित समझते हैं। अदालत ने बच्चों की गवाही से पाया कि जय प्रकाश को घटना के दिन आखिरी बार पीड़िता के साथ उसकी झोपड़ी के अंदर देखा गया था। अदालत ने कहा कि मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था।
सुप्रीम कोर्ट ने मोहम्मद फारूक अब्दुल गफूर बनाम महाराष्ट्र (2010) के मामले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि अदालत उन मामलों में मृत्युदंड की तुलना में आजीवन कारावास को प्राथमिकता दे सकती है, जो पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित हों। पीठ ने कहा, हम इस अपराध की क्रूरता से भी अवगत हैं। एक असहाय बच्ची को पहले तो जय प्रकाश ने मिठाई खरीदने के बहाने बहला-फुसलाकर बच्ची के साथ दुष्कर्म किया। उसके बाद अपराध के सबूत छिपाने के लिए बच्ची को असहाय अवस्था में ही गला घोंटकर मार डाला। इस मामले को दुर्लभतम श्रेणी में डालने के निष्कर्ष पर पहुंचने में अधीनस्थ अदालतों द्वारा किसी अन्य परिस्थिति पर विचार नहीं किया गया। हमारे विचार में इस तरह के दृष्टिकोण को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा, अधीनस्थ न्यायालय अपीलकर्ता से जुड़ी गंभीर और कम करने वाली परिस्थितियों का कोई विस्तृत संदर्भ देने में विफल रहे हैं। अदालतों ने मृत्युदंड देने के लिए अपराध की जघन्य प्रकृति को दोहराया है। परिवीक्षा अधिकारी, जेल प्रशासन और दोषी के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन की रिपोर्टों का अध्ययन करते हुए पीठ ने पाया कि जय प्रकाश के परिवार की स्थिति बहुत दयनीय है और वे मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाते हैं।
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